Thursday, March 26, 2026
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देश के पहले ‘इच्छामृत्यु’ मामले में हरीश राणा ने ली अंतिम सांस, रुला देगी AIIMS की ये कहानी

13 साल तक कोमा के अंधेरे और असहनीय कष्ट में जीवन बिताने वाले हरीश राणा को आखिरकार इस दुनिया के दर्दों से हमेशा के लिए मुक्ति मिल गई है। सुप्रीम कोर्ट की ओर से मिली ऐतिहासिक इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति के बाद, हरीश ने मंगलवार को दिल्ली के एम्स (AIIMS) अस्पताल में अपनी अंतिम सांस ली। यह पूरे देश में कानूनी रूप से दी गई निष्क्रिय इच्छामृत्यु का पहला और बेहद भावुक मामला बन गया है। इस घटना ने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा है और मेडिकल साइंस से लेकर कानूनी गलियारों तक में इसकी चर्चा हो रही है।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद ऐसे थमी सांसें

लंबे समय से अपने बेटे को इस दर्दनाक स्थिति में देख रहे माता-पिता की गुहार पर सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च को एक बड़ा फैसला सुनाया था। अदालत ने डॉक्टरों की कड़ी निगरानी में हरीश राणा के लिए निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी। इसके बाद हरीश को 14 मार्च को एम्स के आईआरसीएच (IRCH) के पैलिएटिव केयर वार्ड में भर्ती कराया गया। एम्स प्रशासन ने इसके लिए विशेषज्ञों के डॉक्टरों की एक विशेष कमेटी गठित की, जिनकी देखरेख में बेहद शांतिपूर्ण तरीके से हरीश का भोजन और पानी धीरे-धीरे बंद कर दिया गया, जिसके बाद मंगलवार को उनका निधन हो गया।

2013 का वो मनहूस दिन और 13 साल का कोमा

हरीश राणा की यह दर्दनाक कहानी साल 2013 में शुरू हुई थी। उस समय हरीश चंडीगढ़ स्थित पंजाब विश्वविद्यालय में बीटेक के एक होनहार छात्र थे। एक दिन अचानक वह हॉस्टल की चौथी मंजिल की बालकनी से नीचे गिर गए, जिससे उनके सिर पर बेहद गंभीर चोटें आईं। इस भयानक हादसे के बाद हरीश सीधे कोमा में चले गए। उनके परिवार और डॉक्टरों ने उन्हें वापस लाने की हर संभव कोशिश की, लेकिन कोई सुधार नहीं हुआ। पिछले 13 सालों से उन्हें सिर्फ एक फूड पाइप के सहारे तरल भोजन दिया जा रहा था और कई बार उन्हें जीवित रखने के लिए ऑक्सीजन सपोर्ट का सहारा भी लेना पड़ता था।

क्या होती है निष्क्रिय इच्छामृत्यु?

इस पूरी प्रक्रिया को लेकर एम्स-दिल्ली की ऑन्को-एनेस्थीसिया, दर्द एवं प्रशामक देखभाल (Palliative Care) विभाग की पूर्व प्रमुख डॉक्टर सुषमा भटनागर ने विस्तार से जानकारी दी है। उन्होंने बताया कि इस प्रक्रिया में मरीज को दर्द से पूरी तरह राहत दिलाते हुए धीरे-धीरे पोषण संबंधी सहायता (भोजन और पानी) को रोकना या हटाना शामिल होता है। इस दौरान मरीज को प्रशामक बेहोशी (Palliative Sedation) की दवाएं दी जाती हैं ताकि उसे किसी भी तरह की शारीरिक परेशानी या तड़प न हो। इसके बाद कृत्रिम पोषण, जीवन रक्षक दवाएं और ऑक्सीजन जैसे उपाय धीरे-धीरे वापस ले लिए जाते हैं। इसका मुख्य उद्देश्य मृत्यु को लंबा खींचना या जल्दी करना नहीं होता, बल्कि मरीज को एक सम्मानजनक और दर्द रहित विदाई देना होता है।

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