Friday, October 23, 2026
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शिक्षकों से मिले पीएम मोदी: पूछा- अच्छा वक्ता बनने के लिए क्या करूं; शिक्षिका के जवाब पर खूब हंसे प्रधानमंत्री

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को कहा कि शिक्षक दिवस समाज में शिक्षकों के अहम योगदान की सराहना करने का दिन है। उन्होंने यह भी कहा कि यह डॉ. एस. राधाकृष्णन को श्रद्धांजलि देने का भी दिन है। इसके अलावा प्रधानमंत्री ने नेशनल टीचर्स अवॉर्ड’ (राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार) विजेताओं के साथ मुलाकात की झलकियां भी साझा की।

प्रधानमंत्री ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, “शिक्षक दिवस हमारे समाज में शिक्षकों के अहम योगदान की सराहना करने का दिन है। यह डॉ. एस. राधाकृष्णन को श्रद्धांजलि देने का दिन भी है। कल जब नेशनल टीचर्स अवॉर्ड्स के विजेताओं को 7, एलकेएम (लोक कल्याण मार्ग) बुलाया गया, तो क्या हुआ, देखिए।”

पीएम मोदी से संवाद करते समय एक महिला अध्यापिका ने बताया कि वह बच्चों को नवाचारी तरीके से साक्षात्कार लेना सिखा रही हैं। इस पर प्रधानमंत्री ने पूछा कि बच्चे घर जाकर मम्मी-पापा का भी इंटरव्यू करते होंगे? पीएम मोदी की इस बात पर महिला टीचर ने ‘हां’ में जवाब दिया। फिर पीएम मोदी ने कहा कि बच्चे अपने माता-पिता से पूछते होंगे कि खाना क्यों पकाया? ऐसा क्यों पकाया? यह निर्णय किसने किया था? बजट कितना खर्च किया था? इस पर महिला अध्यापिका ने कहा कि मेरे स्कूल के सारे बच्चे रिपोर्टर ही बनना चाहते हैं!

एक अन्य महिला शिक्षक ने पीएम मोदी को बताया कि वह बच्चों को केमिस्ट्री पढ़ाने के साथ एनवायरमेंट एजुकेशन भी पढ़ाती हूं। मैं बच्चों को कॉन्फिडेंस के साथ पब्लिक स्पीकिंग के लिए भी मेंटर करती हैं और उन्हें राज्य, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाया है। इस पर प्रधानमंत्री ने पूछा, “आप बच्चों को पब्लिक स्पीकिंग सिखाती हैं। अगर मैं आपका विद्यार्थी हूं और एक अच्छा वक्ता बनना चाहता हूं, तो मुझे क्या करना चाहिए? कोई टिप्स दीजिए।” जवाब में शिक्षिका ने कहा, “आपको कॉन्फिडेंस में रहना चाहिए।” इस पर प्रधानमंत्री और शिक्षिका दोनों हंस पड़े। शिक्षिका ने कहा, “सर, आपका ऑरा देखकर मुझे थोड़ा डाउट हो गया।”

इस पर पीएम मोदी ने कहा कि यानी मतलब आपको पब्लिक स्पीकर बनना है तो ऑरा नहीं होना चाहिए। महिला टीचर ने कहा कि होना चाहिए। इस पर पीएम मोदी ने कहा कि फिर तो लोग सुनेंगे ही नहीं, औरा (आभा) ही देखते रहेंगे। महिला टीचर ने कहा कि आपको देखते ही रहेंगे।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संवाद को आगे बढ़ाते हुए कहा कि हो सकता है कि कोई बच्चा शिक्षा में ठीक नहीं होगा। लेकिन परमात्मा ने हर एक को कोई न कोई ताकत दी है। उसके टैलेंट पहचानने के लिए कोई कोशिश करते हैं आप टीचर लोग?

इस पर एक महिला टीचर ने कहा, “बहुत सारी कोशिश करते हैं, असल में वही हमारी कोशिश होती है, क्योंकि मेरा मानना है कि हमारे विद्यालय या हमारी कक्षा में जितने बच्चे हैं, उन सभी में अलग-अलग खूबी है। अलग-अलग टैलेंट है, अलग-अलग चैलेंज है और एक शिक्षक के नाते मैं उन सारे टैलेंट्स की पहचान करती हूं।”

एक पुरुष अध्यापक ने कहा, “आपने (पीएम मोदी) एकलव्य खोल कर एक स्कूल नहीं बनाया, बल्कि लगभग मेरे हिसाब से कई परिवारों को जोड़ा हैं। ऐसे लोगों को जोड़ा जो फर्सट जनरेशन लर्नर हैं, जिन्होंने कभी स्कूल नहीं देखे। उनके बच्चे आज हमारे यहां से एनआईटी, आईआईटी का सपना देख रहे हैं। मेडिकल क्वालीफाई कर रहे हैं।”

महिला अध्यापिका ने कहा, “शोध का विषय ब्रेस्ट कैंसर रहा है। ब्रेस्ट कैंसर आज भी एक ऐसा विषय है जिसमें महिलाएं बात करने से बहुत हिचकती हैं। कुछ चीजें हमारी क्षमता में है जो हम कर सकते हैं, जैसे कि प्राइमरी स्क्रीनिंग या कुछ ऐसी बातें उनको बताना कि वह ब्रेस्ट कैंसर को पहचान सकें और डॉक्टर की सलाह की जरूरत है। मैं इन विषयों पर काम करती हूं।”

इस पर पीएम मोदी ने कहा, “आप इसी विषय में काम कर रही हैं तो मैं काशी का सांसद हूं। मैंने वहां ब्रेस्ट कैंसर अवेयरनेस अभियान शुरू किया है। मुझे खुशी है कि महिलाएं सामने से आकर अपना चेकअप कराती हैं, पहले ऐसी स्थिति नहीं थी। दूसरे एक अच्छा अनुभव आया। अभी तो एक दिन में अधिकतम लोगों की जांच करने का गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड उन्होंने रजिस्टर किया।”

प्रधानमंत्री ने आगे कहा, “एक विषय है स्क्रीन टाइम, जो अब एक तरह का एडिक्शन बन गया है। मेरे मन में एक विचार आता है, अगर बच्चा खेलकूद में ज्यादा रुचि लेने लगे, मैदान में खेलने लगे, तो वह धीरे-धीरे इस एडिक्शन से बाहर आ सकता है। हमें बच्चों को ज्यादा से ज्यादा क्रिएटिविटी से जोड़ना चाहिए और ऐसे कार्यक्रमों को आदत बनाना चाहिए।”

प्रधानमंत्री ने कहा, “अब जैसे ड्रग्स का मामला है। कई बार पता ही नहीं चलता कि क्या हो रहा है, कोई आकर कुछ दे जाता है। क्या इस बारे में शिक्षकों में लगातार जागरूकता है? क्या कोई बारीकी से यह ऑब्जर्व कर रहा है कि किसी बच्चे के व्यवहार में बदलाव तो नहीं आ रहा? मैं पूरे शिक्षा जगत से कहना चाहता हूं कि हमें किताबों और सिलेबस से बाहर निकलकर बच्चों की जिंदगी में झांकना होगा। बचपन को मरने नहीं देना है, और बचपन को बनाए रखने का सबसे बड़ा काम शिक्षक ही कर सकता है।”

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