मिडिल ईस्ट में चल रहे भारी तनाव और संघर्ष के बीच ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर अपना पहरा बेहद कड़ा कर दिया है। इसके परिणामस्वरूप इस अहम समुद्री रूट से कच्चे तेल और एलपीजी गैस की आपूर्ति बुरी तरह चरमरा गई है, जिसका सीधा असर भारत पर भी पड़ रहा है। इस गंभीर संकट को देखते हुए केंद्र की मोदी सरकार ने एक बेहद बड़ा और ऐतिहासिक फैसला लिया है। देश की तेल और गैस की बढ़ती जरूरतों को पूरा करने के लिए अब समुद्र की गहराइयों में छिपे ऊर्जा के विशाल भंडारों का पता लगाने के लिए एक महा-सर्वेक्षण अभियान शुरू किया जा रहा है।
पूर्वी तट पर अंडरवाटर खजाना खोजेगी सरकार
सरकारी दस्तावेजों के अनुसार, भारत सरकार का हाइड्रोकार्बन महानिदेशालय (DGH) बंगाल की खाड़ी में गहरे समुद्र के नीचे मौजूद तेल और प्राकृतिक गैस के विशाल भंडारों की तलाश के लिए एक व्यापक सर्वेक्षण शुरू करने जा रहा है। मोदी सरकार देश के पूर्वी तट पर एक मल्टी-बेसिन भूगर्भीय सर्वेक्षण की योजना पर काम कर रही है। इस महत्वाकांक्षी परियोजना को गति देने के लिए हाल ही में 14 मई 2026 को आधिकारिक तौर पर निविदाएं भी आमंत्रित कर दी गई हैं।
समुद्र तल का विशाल अंडरग्राउंड स्कैन है यह तकनीक
तकनीकी भाषा में इस महा-अभियान को ‘2D ब्रॉडबैंड मरीन सीस्मिक एंड ग्रेविटी-मैग्नेटिक डेटा एक्विजिशन, प्रोसेसिंग एंड इंटरप्रिटेशन’ का नाम दिया गया है। आसान शब्दों में समझें तो यह समुद्र तल का एक बेहद विशाल अंडरग्राउंड स्कैन होने वाला है। इस अत्याधुनिक प्रक्रिया के तहत विशेष सर्वेक्षण जहाज समुद्र में अपने पीछे ‘स्ट्रीमर्स’ नामक लंबे केबल जैसे उपकरण खींचेंगे। ये उपकरण समुद्र की गहराइयों में शक्तिशाली ध्वनि तरंगें भेजेंगे और चट्टानों से टकराकर वापस आने वाली गूंज को रिकॉर्ड करेंगे। इसी अहम डेटा के आधार पर वैज्ञानिक समुद्र तल के कई किलोमीटर नीचे की विस्तृत तस्वीरें तैयार करेंगे, जिससे तेल और गैस के सटीक स्रोतों का आसानी से पता चल सकेगा।
लाखों किलोमीटर के विशाल दायरे में चलेगा अभियान
यह कोई आम खोज नहीं है, बल्कि इस परियोजना का पैमाना इतना विशाल है कि यह सर्वेक्षण अगले दो वर्षों तक लगातार चलेगा। इसके तहत बंगाल-पूर्णिया और महानदी बेसिन तक 45,000 लाइन किलोमीटर (LKM) के विशाल इलाके में सर्वे किया जाएगा। इसके साथ ही अंडमान बेसिन में 43,000 एलकेएम, कृष्णा-गोदावरी (KG) बेसिन में 43,000 एलकेएम और कावेरी बेसिन में 30,000 एलकेएम के क्षेत्र में भी गहराई से खोज अभियान चलाया जाएगा।
विदेशी निर्भरता खत्म करने की दिशा में बड़ा कदम
भारत फिलहाल अपनी कच्चे तेल की कुल आवश्यकता का लगभग 85 प्रतिशत और गैस की जरूरत का एक बहुत बड़ा हिस्सा दूसरे देशों से आयात करता है। पश्चिम एशिया में युद्ध या किसी भी वैश्विक भू-राजनीतिक उथल-पुथल का सीधा असर भारतीय घरों के बजट, ईंधन की कीमतों और महंगाई पर पड़ता है। अधिकारियों का मानना है कि मुंबई हाई जैसे पश्चिमी तटों की तुलना में भारत का पूर्वी तट अभी भी काफी हद तक अनछुआ है। आधुनिक सीस्मिक तकनीक के जरिए इस पूरे क्षेत्र का सटीक नक्शा तैयार कर भारत आयात पर अपनी इस भारी निर्भरता और कमजोरी को हमेशा के लिए दूर करना चाहता है।
इन पांच प्रमुख क्षेत्रों पर टिकी हैं सबसे ज्यादा उम्मीदें
विशेषज्ञों और भूवैज्ञानिकों की नजरें मुख्य रूप से पांच प्रमुख अपतटीय क्षेत्रों पर टिकी हुई हैं। दस्तावेजों के मुताबिक, बंगाल अपतटीय बेसिन में 10 किलोमीटर से अधिक मोटी तलछटी परतें मौजूद हैं, जहां इओसीन युग से लेकर हाल के भूगर्भीय काल तक के हाइड्रोकार्बन स्रोत होने की भारी संभावना है। वहीं, महानदी बेसिन को व्यावसायिक उत्पादन की उच्च क्षमता वाला एक प्रमुख क्षेत्र माना जा रहा है। इसके अलावा अंडमान बेसिन में म्यांमार और इंडोनेशिया के गैस क्षेत्रों जैसी भूगर्भीय समानताएं होने के कारण वहां जमे हुए मीथेन और गैस के विशाल भंडार मिलने की उम्मीद है। भारत के पहले से ही प्रमुख गैस उत्पादक माने जाने वाले कृष्णा-गोदावरी बेसिन और प्रमाणित पेट्रोलीफेरस बेसिन कावेरी के गहरे अपतटीय हिस्सों में भी अभी बड़ी मात्रा में अनदेखे भंडार मिलने की पूरी संभावना है, जो देश की ऊर्जा जरूरतों को काफी हद तक पूरा कर सकते हैं।


