पटना हाई कोर्ट के एक हालिया फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताते हुए कहा है कि यौन अपराधों से जुड़े मामलों में न्यायिक संवेदनशीलता और कानूनी समझ बेहद आवश्यक है। शीर्ष अदालत ने टिप्पणी की कि ऐसे मामलों में फैसला सुनाने से पहले न्यायाधीशों को पर्याप्त शोध और स्थापित कानूनी सिद्धांतों का ध्यान रखना चाहिए।
मंगलवार को मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष यह मामला उठाया गया। सुनवाई के दौरान अदालत ने उस टिप्पणी पर गंभीर आपत्ति जताई, जिसमें पटना हाई कोर्ट ने कहा था कि महिला की सलवार उतारने की कोशिश करना और उसकी छाती दबाना बलात्कार का प्रयास नहीं माना जा सकता। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि महिलाओं से जुड़े मामलों में अदालतों को विशेष संवेदनशीलता बरतनी चाहिए और ऐसी टिप्पणियों से बचना चाहिए जो न्यायिक दृष्टिकोण पर सवाल खड़े करें।
सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी की उस रिपोर्ट का भी उल्लेख किया, जो न्यायिक संवेदनशीलता को लेकर तैयार की गई है। अदालत ने निर्देश दिया कि यौन अपराधों से संबंधित इस रिपोर्ट को सभी उच्च न्यायालयों की वेबसाइटों पर तत्काल अपलोड किया जाए, ताकि न्यायिक अधिकारियों को निर्धारित दिशानिर्देशों का पालन सुनिश्चित कराया जा सके।
इलाहाबाद हाई कोर्ट के पुराने फैसले का भी हुआ उल्लेख
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा गुप्ता ने अदालत का ध्यान इस ओर दिलाया कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा पूर्व में जारी निर्देशों के बावजूद 9 जुलाई को पटना हाई कोर्ट ने इसी तरह का आदेश पारित किया। उन्होंने याद दिलाया कि मार्च 2025 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने भी एक मामले में नाबालिग लड़की का पायजामा खोलने और उसकी छाती दबाने की घटना को बलात्कार का प्रयास नहीं माना था। उस फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया था।
इस पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा कि न्यायपालिका के लिए तैयार विशेष हैंडबुक और दिशानिर्देशों का प्रभावी अनुपालन सुनिश्चित किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि सभी उच्च न्यायालयों और अधीनस्थ अदालतों को इन दिशानिर्देशों का पालन करना अनिवार्य है। साथ ही राज्य सरकारों को भी निर्देश दिए जाएं कि पुलिस एफआईआर दर्ज करने और चार्जशीट दाखिल करते समय इन मानकों का पालन करे।
क्या है पटना हाई कोर्ट का मामला?
विवाद की शुरुआत 9 जुलाई को पटना हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति पूर्णेंदु सिंह के फैसले से हुई। उन्होंने वर्ष 2008 के एक मामले में आरोपी की बलात्कार के प्रयास की सजा रद्द करते हुए कहा कि महिला की सलवार उतारने का प्रयास करना और उसकी छाती दबाना उसकी शालीनता भंग करने का अपराध तो हो सकता है, लेकिन इसे कानूनन बलात्कार का प्रयास नहीं माना जा सकता।
यह मामला बिहार के बांका जिले के अमरपुर स्थित एक फोटोग्राफी स्टूडियो से जुड़ा है। आरोप के अनुसार, पीड़िता अपने पिता के साथ फोटो खिंचवाने स्टूडियो गई थी। तस्वीर लेने के बाद स्टूडियो संचालक ने फोटो देखने के बहाने पिता को बाहर भेज दिया और अंदर से दरवाजा बंद कर दिया। आरोप है कि उसने पीड़िता के साथ बलात्कार की नीयत से उसकी छाती दबाई और सलवार उतारने की कोशिश की। पीड़िता की चीख सुनकर उसके पिता दरवाजे की ओर दौड़े, जिसके बाद आरोपी मौके से फरार हो गया।
अब इसी फैसले को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर आपत्ति जताते हुए न्यायिक संवेदनशीलता और स्थापित कानूनी मानकों के पालन की आवश्यकता पर जोर दिया।


