आमतौर पर कॉर्पोरेट सेक्टर में काम करने वाले युवा वीकेंड पर आराम करना पसंद करते हैं, लेकिन नोएडा के दो युवाओं ने शनिवार और रविवार को कमाई का अनोखा जरिया बना लिया। सप्ताह के पांच दिन ऑफिस में नौकरी करने वाले 26 वर्षीय ऋषभ कुमार और शशिकांत सिंह वीकेंड पर मटन का फूड कार्ट लगाते हैं। महज 35 हजार रुपये के शुरुआती निवेश से शुरू किए गए उनके इस कारोबार ने पहले ही महीने में 6 लाख रुपये का कारोबार कर सबको चौंका दिया। खास बात यह है कि लोकप्रियता बढ़ने के बावजूद दोनों दोस्तों ने 5 करोड़ रुपये की वैल्यूएशन के आधार पर मिले निवेश प्रस्ताव को ठुकरा दिया।
नोएडा के सेक्टर-76 में ‘लाहम’ नाम से शुरू किए गए इस फूड कार्ट की खासियत इसका पारंपरिक अंदाज में तैयार किया जाने वाला नमकीन गोश्त है। ऋषभ की बहन प्रियंका भी इस कारोबार में अहम भूमिका निभा रही हैं और रसोई की जिम्मेदारी संभालती हैं।
35 हजार रुपये से शुरू किया कारोबार
ऋषभ और शशिकांत पहले बेंगलुरु में एक साथ काम करते थे। इसी साल दोनों नोएडा पहुंचे और नौकरी के साथ अपना कारोबार शुरू करने की योजना बनाई। ऋषभ को फैशन और खानपान दोनों क्षेत्रों में रुचि थी, लेकिन फैशन कारोबार के लिए अधिक पूंजी की जरूरत को देखते हुए उन्होंने फूड बिजनेस का विकल्प चुना।
दोनों ने बाजार की मांग समझने और कारोबार की योजना बनाने के लिए चैटजीपीटी तथा अपने प्रोडक्ट मैनेजमेंट के अनुभव का इस्तेमाल किया। इसके बाद करीब 35 हजार रुपये खर्च कर फूड कार्ट, लाइट्स और खाना बनाने का जरूरी सामान खरीदा। 5 सितंबर को उन्होंने अपना स्टॉल शुरू किया। शुरुआत में सप्ताह में केवल दो दिन दुकान लगाने का फैसला किया गया। इसका नतीजा यह रहा कि पहले ही महीने में कारोबार 6 लाख रुपये तक पहुंच गया।
तीन घंटे में खत्म हो जाता है मटन
‘लाहम’ के नमकीन गोश्त की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि स्टॉल खुलने के तीन घंटे के भीतर ही पूरा स्टॉक बिक जाता है। कई बार ग्राहकों को टोकन लेकर करीब 45 मिनट तक इंतजार करना पड़ता है।
शुरुआत में दोनों दोस्त प्रतिदिन केवल 2.5 किलो मटन तैयार करते थे और करीब 25 प्लेट बेच पाते थे। अब उनकी बिक्री बढ़कर प्रतिदिन लगभग 25 किलो मटन तक पहुंच गई है। पहले दिन शुरुआती दस मिनट तक कोई ग्राहक नहीं आया था, लेकिन इसके बाद एक ग्राहक ने खाना चखने के बाद दोबारा बड़ी प्लेट का ऑर्डर दे दिया। धीरे-धीरे उनके स्टॉल की चर्चा आसपास के इलाकों में फैल गई।
पेशावर के जायके को मालाबार परांठे के साथ परोसते हैं
‘लाहम’ अरबी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ गोश्त होता है। ऋषभ का यह व्यंजन पाकिस्तान के पेशावर और खैबर पख्तूनख्वा के लोकप्रिय स्ट्रीट फूड ‘लाहम चरसी’ से प्रेरित है। इसकी खासियत यह है कि मटन को बहुत कम मसालों के साथ पकाया जाता है, जिससे उसका प्राकृतिक स्वाद बरकरार रहता है।
इसे केरल के छोटे-छोटे मालाबार कॉइन परांठों के साथ परोसा जाता है। ग्राहकों के लिए तीन तरह की प्लेट उपलब्ध हैं। हाफ प्लेट में दो परांठे 159 रुपये, फुल प्लेट में चार परांठे 279 रुपये और लार्ज प्लेट में छह परांठे 399 रुपये में मिलते हैं।
कई मुश्किलों के बावजूद जारी रखा कारोबार
इस कारोबार को शुरू करना दोनों दोस्तों के लिए आसान नहीं रहा। शुरुआत में वे शशिकांत के किराए के फ्लैट में मटन तैयार करते थे, लेकिन मकान मालिक की आपत्ति के बाद उन्हें क्लाउड किचन का सहारा लेना पड़ा।
एक बार 20 किलो मटन तैयार होने के बावजूद स्टॉल लगाने की अनुमति नहीं मिली। ऐसे में दोनों ने सोशल मीडिया और व्हाट्सऐप के जरिए टेकअवे ऑर्डर लेना शुरू कर दिया। दिलचस्प बात यह रही कि उस दिन भी उनका पूरा मटन बिक गया। इसके बाद उन्होंने अपना कार्ट निजी परिसर में शिफ्ट कर दिया, ताकि अनुमति संबंधी परेशानियों से बचा जा सके।
नौकरी के साथ परिवार भी संभाल रहा कारोबार
दोनों दोस्तों ने कारोबार की जिम्मेदारियां भी बांट रखी हैं। ऋषभ खाना बनाने के साथ मार्केटिंग और सोशल मीडिया कंटेंट देखते हैं, जबकि शशिकांत वित्तीय प्रबंधन, संचालन और सामान की खरीदारी संभालते हैं। ऋषभ की बहन प्रियंका रसोई और भोजन तैयार करने की जिम्मेदारी निभाती हैं। उनके बचपन के दोस्त अर्पित सिंह और कॉलेज के दोस्त रचित भी संचालन और बिलिंग में मदद करते हैं।
दुर्गा पूजा पंडाल और दिल्ली के मशहूर फूड फेस्टिवल ‘हॉर्न ओके प्लीज’ में भी उन्होंने स्टॉल लगाए। उस दौरान दोनों दोस्त अपनी कॉर्पोरेट नौकरी में व्यस्त थे, इसलिए प्रियंका ने अकेले ही रसोई की जिम्मेदारी संभाली। कारोबार के कारण दोनों दोस्तों की दिनचर्या काफी व्यस्त हो गई है। वीकेंड पर देर रात तक काम करने के बाद सुबह फिर से तैयारी शुरू करनी पड़ती है।
5 करोड़ की वैल्यूएशन वाला प्रस्ताव ठुकराया
‘लाहम’ की बढ़ती लोकप्रियता के बीच एक निवेशक ने कंपनी की 5 करोड़ रुपये की वैल्यूएशन के आधार पर 1 करोड़ रुपये के शेयर खरीदने का प्रस्ताव दिया था। हालांकि, दोनों दोस्तों ने फिलहाल बाहरी निवेश लेने से इनकार कर दिया। उनका मानना है कि वे अपने संसाधनों और कारोबार से होने वाले मुनाफे के दम पर इस ब्रांड को आगे बढ़ाना चाहते हैं।
दोनों ने अगले तीन वर्षों तक कारोबार से निजी कमाई नहीं निकालने और पूरा मुनाफा विस्तार में लगाने की योजना बनाई है। उनका लक्ष्य पहले दिल्ली-एनसीआर और अपने गृह नगर गोरखपुर में कई कार्ट और कियोस्क शुरू करना है। इसके बाद मुंबई में एक शानदार फाइन-डाइनिंग रेस्टोरेंट खोलने का सपना है।
ऋषभ का कहना है कि वह अपनी कॉर्पोरेट नौकरी तब तक नहीं छोड़ेंगे, जब तक इस कारोबार से उन्हें हर महीने कम से कम 4 लाख रुपये की व्यक्तिगत कमाई होने न लगे। फिलहाल दोनों दोस्त नौकरी और कारोबार के बीच संतुलन बनाते हुए अपने छोटे से फूड कार्ट को बड़े ब्रांड में बदलने की कोशिश कर रहे हैं।


