हाईकोर्ट ने आदेश में स्पष्ट किया कि दादा-दादा को अदालत कानूनी संरक्षक करार नहीं दे रही है। बच्ची को रोजाना याची से मिलने के लिए समय देने का हाईकोर्ट ने दादा-दादी को आदेश दिया है। साथ ही बच्चे से रिश्ते बेहतर होने पर उसे कस्टडी के लिए दावा करने की छूट दी है।

आठ साल की बच्ची के आंसुओं ने अवैध कस्टडी से जुड़े एक मामले में हाईकोर्ट को अपना आदेश बदलने पर मजबूर कर दिया। अदालत ने जैसे ही बच्ची को उसकी मां को सौंपने का आदेश दिया तो वह फूट-फूटकर रोने लगी। इसके बाद हाईकोर्ट ने अपने आदेश को बदलते हुए उसे सौतेले पिता के अभिभावक (दादा-दादी) के पास ही रखने को सही माना। कोर्ट ने कहा कि बच्ची बचपन से ही दादा-दादी से भावनात्मक रूप से जुड़ी है ऐसे में इस प्रकार उन्हें अलग करना ठीक नहीं है।


