Sunday, April 19, 2026
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संपत्ति का अधिकार संवैधानिक अधिकार…मुआवजे से जुड़े मामले पर Supreme Court की टिप्पणी

Supreme Court ने बेंगलुरु-मैसूरु इंफ्रास्ट्रक्चर कॉरिडोर प्रोजेक्ट के लिए भूमि अधिग्रहण में मुआवजे के मामले में अहम फैसला सुनाया है. जस्टिस बी आर गवई और के वी विश्वनाथन की बेंच ने कहा कि संपत्ति का अधिकार एक संवैधानिक अधिकार है. किसी व्यक्ति को कानून के अनुसार पर्याप्त मुआवजा दिए बिना उसको संपत्ति से वंचित नहीं किया जा सकता है.

कोर्ट ने कहा, संविधान अधिनियम 1978 के कारण संपत्ति का अधिकार एक मौलिक अधिकार नहीं रह गया है. हालांकि, यह एक कल्याणकारी राज्य और संविधान में एक मानव अधिकार बना हुआ है. संविधान के अनुच्छेद 300-ए में प्रावधान है कि कानून के अधिकार के अलावा किसी भी व्यक्ति को उसकी संपत्ति से वंचित नहीं किया जाएगा.

कोर्ट ने मामले में क्या – क्या कहा?

Supreme Court ने बेंगलुरु-मैसूर इंफ्रास्ट्रक्चर कॉरिडोर प्रोजेक्ट (बीएमआईसीपी) के लिए भूमि अधिग्रहण से संबंधित मामले में कर्नाटक हाई कोर्ट के नवंबर 2022 के फैसले को चुनौती देने वाली अपील पर फैसला सुनाया.

बेंच ने कहा, संपत्ति का अधिकार अब मौलिक अधिकार नहीं है, भारत के संविधान के अनुच्छेद 300-ए के प्रावधानों के मद्देनजर यह एक संवैधानिक अधिकार है. साथ ही कोर्ट ने कहा, किसी व्यक्ति को कानून के अनुसार पर्याप्त मुआवजा दिए बिना उसकी संपत्ति से वंचित नहीं किया जा सकता है.

क्या था पूरा मामला?

जनवरी 2003 में, प्रोजेक्ट के लिए भूमि अधिग्रहण के लिए कर्नाटक औद्योगिक क्षेत्र विकास बोर्ड (केआईएडीबी) ने एक अधिसूचना जारी की थी और नवंबर 2005 में अपीलकर्ताओं की जमीन पर कब्जा कर लिया गया था.

Supreme Court ने इस केस में पाया कि प्रोजेक्ट के लिए लोगों की जमीन पर कब्जा किया गया और उन्हें इस के लिए मुआवजा भी नहीं दिया गया. बिना मुआवजे के लोगों को उनकी जमीन से वंचित कर दिया गया. कोर्ट ने कहा पिछले 22 साल से इन जमीन मलिकों ने कई बार अदालत के दरवाजे खटखटाए.

बेंच ने कहा कि अवमानना ​​कार्यवाही में नोटिस जारी होने के बाद ही, विशेष भूमि अधिग्रहण अधिकारी (एसएलएओ) ने 22 अप्रैल, 2019 को अधिग्रहित भूमि के बाजार मूल्य का निर्धारण करने के लिए 2011 में प्रचलित दिशानिर्देश मूल्यों को ध्यान में रखते हुए मुआवजा निर्धारित किया गया था.

साथ ही कोर्ट ने कहा, अगर साल 2003 के बाजार मूल्य के तहत लोगों को मुआवजा देने की इजाजत दी गई तो यह न्याय का मजाक उड़ाने और अनुच्छेद 300-ए के तहत संवैधानिक प्रावधानों का मजाक बनाने जैसा होगा.

सुप्रीम कोर्ट ने भारत के संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अदालत की शक्ति का इस्तेमाल करते हुए, SLAO को निर्देश दिया कि वो 22 अप्रैल 2019 के बाजार मूल्य के हिसाब से लोगों को उनकी जमीन का मुआवजा दें.

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