Friday, April 17, 2026
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‘मेरे देश की धरती सोना उगले…’, मनोज कुमार क्यों चाहते थे इस हरित क्रांति के गांव में शूटिंग करना

मनोज कुमार फिल्म उपकार के अमर गीत ‘मेरे देश की धरती सोना उगले…’ की शूटिंग हरित क्रांति से जुडे गांव जोंती में करना चाहते थे। लेकिन उन्हें इसकी शूटिंग बाहरी दिल्ली के नांगला ठकरन गांव में करनी पड़ी, जो गांव जोंती के करीब है।

 

मनोज कुमार नहीं रहे। वे चाहते थे कि अपनी 1967 में प्रदर्शित फिल्म उपकार के अमर गीत ‘मेरे देश की धरती सोना उगले…’ की शूटिंग हरित क्रांति से जुडे गांव जोंती में करें। ये गांव बाहरी दिल्ली में कंझावला मेट्रो स्टेशन के करीब है। उन्होंने कई बार जोंती की खाक भी छानी। पर ये विभिन्न कारणों से मुमकिन नहीं हुआ।

हारकर उन्होंने इस अमर गीत की शूटिंग बाहरी दिल्ली के नांगला ठकरन गांव में की। ये गांव जोंती के करीब ही है। जोंती को आप हरित क्रांति का गांव कह सकते हैं। इसकी चर्चा किए बिना हरित क्रांति पर बात पूरी नहीं हो सकती। राजधानी के भारतीय कृषि अनुसंधान, पूसा में गेंहू की फसल का उत्पादन बढ़ाने के लिए गेंहू के उन्नतशील बीज विकसित किए थे, नोबल पुरस्कार विजेता प्रोफेसर नारमन बोरलॉग और कृषि वैज्ञानिक डॉ. एम. एस. स्वामीनाथन की टीम ने। ये बात है 1960 के दशक की। उसके बाद इन्हीं बीजों को पूसा कैंपस और दिल्ली के किसी गांव में लगाने का फैसला हुआ। इसके पीछे उद्देश्य था ताकि पता चल सके कि इन बीजों से किस तरह की पैदावार होती है।

अब मसला पैदा हुआ कि किस गांव में इन बीजों को लगाया जाए। तब कृषि वैज्ञानिकों की खोजबीन के बाद जोंती गांव का चयन हुआ था। इसलिए मनोज कुमार उपकार फिल्म के कुछ हिस्से को जोंती में शूट करना चाहते थे।

उन्होंने ये सारा किस्सा खुद इस खाकसार को 1999 में राजधानी के तिलक मार्ग पर स्थित सागर अपार्टमेंट्स के फ्लैट में सुनाया था।  वह कहते थे कि इन अन्नदाताओं का कर्ज हम उतार नहीं सकते। मनोज कुमार का परिवार 1947 में पकिस्तान के शहर एबटाबाद से दिल्ली में आया था। एबटाबाद में ही ओसामा बिल लादेन छिपा था।

दिल्ली में उनका परिवार विजय नगर में रहने लगा था। यहां अब भी कुछ लोग हैं, जिन्हें याद है कि मनोज कुमार को अड़ोस-पड़ोस में प्यार से सब गुल्लू कहते थे। वे बेहद खूबसूरत नौजवान थे। उनका गोरा रंग, घुंघराले बाल, लंबा कद उन्हें बांकी से अलग खड़ा करता था। उनके पिता को विजय नगर में बाऊ जी कहते थे। उनके परिवार को शुरुआती दौर में कुछ समय तक दिल्ली में शरणार्थियों के लिए बने बैरकों में भी रहना पड़ा था। उन्होंने राजधानी में बिड़ला स्कूल और हिन्दू कॉलेज में पढ़ाई की। वे  फिल्मों में जाना चाहते थे। हरबंस लाल गोस्वामी ने कोशिश करके अपने बेटे को किसी तरह मुंबई भेजा।

गुल्लू मुंबई जाकर मनोज कुमार बन गया। अपनी मेहनत और अभिनय की वजह से उन्होंने फिल्मी दुनिया में जगह बनाई। उनकी पहली फिल्म फैशन थी, जिसमें उनका साइड रोल था।  इस बीच उनकी  कांच की गुड़िया, शहीद, उपकार, हरियाली और रास्ता, पूर्व और पश्चिम, रोटी-कपड़ा और मकान जैसी अनेक फिल्में हिट हुईं।

मनोज कुमार का शुक्रवार सुबह हुआ निधन

भारतीय अभिनेता और फिल्म निर्देशक मनोज कुमार का शुक्रवार सुबह निधन हो गया। वे 87 साल के थे। उन्हें अपनी देशभक्ति फिल्मों के लिए जाना जाता था। उनकी देश प्रेम वाली फिल्मों के लिए उन्हें ‘भारत कुमार’ के नाम से भी जाना जाता था। उन्होंने कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी अस्पताल में अंतिम सांस ली। इस खबर के बाद पूरे देश में शोक की लहर है।

मेडिकल रिपोर्ट के मुताबिक, ‘भारत कुमार’ के नाम से मशहूर अभिनेता ने सुबह 3:30 बजे अंतिम सांस ली। उनके निधन की वजह दिल का दौरा बताई गई। रिपोर्ट ने यह भी पुष्टि की गई कि मनोज कुमार पिछले कुछ महीनों से डीकंपेंसेटेड लिवर सिरोसिस से जूझ रहे थे। उनकी हालत बिगड़ने के बाद उन्हें 21 फरवरी, 2025 को अस्पताल में भर्ती कराया गया था। 

भारतीय सिनेमा में मनोज कुमार के योगदान को हमेशा याद रखा जाएगा। उन्हें कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया था। उनके नाम एक राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और अलग-अलग श्रेणियों में सात फिल्मफेयर पुरस्कार शामिल हैं। भारतीय कला में उनके अपार योगदान के सम्मान में सरकार ने उन्हें 1992 में पद्म श्री से सम्मानित किया। उन्हें 2015 में दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

कुछ माह दिल्ली के शरणार्थी कैंप में भी गुजारे
मनोज कुमार का जन्म 24 जुलाई, 1937 को अविभाजित भारत के एबटाबाद शहर (अब पाकिस्तान) में एक पंजाबी हिंदू परिवार में हुआ था और उस समय उनका नाम हरिकिशन गिरि गोस्वामी रखा गया था। विभाजन के समय उनका परिवार पाकिस्तान छोड़कर भारत आ गया और उन्होंने कुछ माह दिल्ली के शरणार्थी कैंप में भी गुजारे। 1957 में फिल्म ‘फैशन’ में एक छोटी-सी भूमिका के साथ उन्होंने रुपहले परदे पर कदम रखा। फिर सहारा (1958), चांद (1959) और हनीमून (1960) जैसी फिल्मों में दिखे, लेकिन कोई खास कमाल नहीं दिखा सके। 1965 में आई उनकी देशभक्ति फिल्म ‘शहीद’ न केवल बॉक्स ऑफिस पर हिट रही, बल्कि इसने आलोचकों को भी जवाब दिया। तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री से भी उनको प्रशंसा मिली।

मेरे देश की धरती… हर जुबां पर चढ़ा

‘उपकार’ मनोज कुमार के निर्देशन में पहली फिल्म थी। 1967 में आई इस फिल्म का गाना ‘मेरे देश की धरती…’ बेहद लोकप्रिय हुआ था। 1960 और 1970 के दशक में उनकी फिल्मों का बॉक्स ऑफिस पर बोलबाला रहा। उन्होंने ‘पूरब और पश्चिम’, ‘रोटी कपड़ा और मकान’ जैसी फिल्मों में उभरते भारत की तस्वीर से लेकर विभाजन के दर्द को बखूबी बयां किया। ‘पूरब और पश्चिम’ यूके में भी रिलीज की गई, जहां इसने 50 सप्ताह से अधिक समय तक थिएटर में लगे रहने का रिकॉर्ड बनाया था।
‘उपकार’ ने जीते चार फिल्मफेयर

1968 में ‘उपकार’ ने सर्वश्रेष्ठ फिल्म, सर्वश्रेष्ठ डायरेक्टर, सर्वश्रेष्ठ कहानी और सर्वश्रेष्ठ संवाद श्रेणी में चार पुरस्कार जीते। 1972 में फिल्म ‘बेईमान’ के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता और ‘शोर’ के लिए सर्वश्रेष्ठ संपादन, 1975 में ‘रोटी कपड़ा और मकान’ के लिए सर्वश्रेष्ठ निर्देशक के लिए फिल्मफेयर मिला। 1999 में मनोज कुमार को फिल्मफेयर ने लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड से सम्मानित किया। 1968 में ‘उपकार’ को दूसरी सर्वश्रेष्ठ फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। 2008 में किशोर कुमार अवार्ड और 2010 में राज कपूर अवार्ड से भी सम्मानित किया गया।

 

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