मनोज कुमार फिल्म उपकार के अमर गीत ‘मेरे देश की धरती सोना उगले…’ की शूटिंग हरित क्रांति से जुडे गांव जोंती में करना चाहते थे। लेकिन उन्हें इसकी शूटिंग बाहरी दिल्ली के नांगला ठकरन गांव में करनी पड़ी, जो गांव जोंती के करीब है।
मनोज कुमार नहीं रहे। वे चाहते थे कि अपनी 1967 में प्रदर्शित फिल्म उपकार के अमर गीत ‘मेरे देश की धरती सोना उगले…’ की शूटिंग हरित क्रांति से जुडे गांव जोंती में करें। ये गांव बाहरी दिल्ली में कंझावला मेट्रो स्टेशन के करीब है। उन्होंने कई बार जोंती की खाक भी छानी। पर ये विभिन्न कारणों से मुमकिन नहीं हुआ।
हारकर उन्होंने इस अमर गीत की शूटिंग बाहरी दिल्ली के नांगला ठकरन गांव में की। ये गांव जोंती के करीब ही है। जोंती को आप हरित क्रांति का गांव कह सकते हैं। इसकी चर्चा किए बिना हरित क्रांति पर बात पूरी नहीं हो सकती। राजधानी के भारतीय कृषि अनुसंधान, पूसा में गेंहू की फसल का उत्पादन बढ़ाने के लिए गेंहू के उन्नतशील बीज विकसित किए थे, नोबल पुरस्कार विजेता प्रोफेसर नारमन बोरलॉग और कृषि वैज्ञानिक डॉ. एम. एस. स्वामीनाथन की टीम ने। ये बात है 1960 के दशक की। उसके बाद इन्हीं बीजों को पूसा कैंपस और दिल्ली के किसी गांव में लगाने का फैसला हुआ। इसके पीछे उद्देश्य था ताकि पता चल सके कि इन बीजों से किस तरह की पैदावार होती है।
अब मसला पैदा हुआ कि किस गांव में इन बीजों को लगाया जाए। तब कृषि वैज्ञानिकों की खोजबीन के बाद जोंती गांव का चयन हुआ था। इसलिए मनोज कुमार उपकार फिल्म के कुछ हिस्से को जोंती में शूट करना चाहते थे।
उन्होंने ये सारा किस्सा खुद इस खाकसार को 1999 में राजधानी के तिलक मार्ग पर स्थित सागर अपार्टमेंट्स के फ्लैट में सुनाया था। वह कहते थे कि इन अन्नदाताओं का कर्ज हम उतार नहीं सकते। मनोज कुमार का परिवार 1947 में पकिस्तान के शहर एबटाबाद से दिल्ली में आया था। एबटाबाद में ही ओसामा बिल लादेन छिपा था।
दिल्ली में उनका परिवार विजय नगर में रहने लगा था। यहां अब भी कुछ लोग हैं, जिन्हें याद है कि मनोज कुमार को अड़ोस-पड़ोस में प्यार से सब गुल्लू कहते थे। वे बेहद खूबसूरत नौजवान थे। उनका गोरा रंग, घुंघराले बाल, लंबा कद उन्हें बांकी से अलग खड़ा करता था। उनके पिता को विजय नगर में बाऊ जी कहते थे। उनके परिवार को शुरुआती दौर में कुछ समय तक दिल्ली में शरणार्थियों के लिए बने बैरकों में भी रहना पड़ा था। उन्होंने राजधानी में बिड़ला स्कूल और हिन्दू कॉलेज में पढ़ाई की। वे फिल्मों में जाना चाहते थे। हरबंस लाल गोस्वामी ने कोशिश करके अपने बेटे को किसी तरह मुंबई भेजा।
गुल्लू मुंबई जाकर मनोज कुमार बन गया। अपनी मेहनत और अभिनय की वजह से उन्होंने फिल्मी दुनिया में जगह बनाई। उनकी पहली फिल्म फैशन थी, जिसमें उनका साइड रोल था। इस बीच उनकी कांच की गुड़िया, शहीद, उपकार, हरियाली और रास्ता, पूर्व और पश्चिम, रोटी-कपड़ा और मकान जैसी अनेक फिल्में हिट हुईं।
मनोज कुमार का शुक्रवार सुबह हुआ निधन
मेडिकल रिपोर्ट के मुताबिक, ‘भारत कुमार’ के नाम से मशहूर अभिनेता ने सुबह 3:30 बजे अंतिम सांस ली। उनके निधन की वजह दिल का दौरा बताई गई। रिपोर्ट ने यह भी पुष्टि की गई कि मनोज कुमार पिछले कुछ महीनों से डीकंपेंसेटेड लिवर सिरोसिस से जूझ रहे थे। उनकी हालत बिगड़ने के बाद उन्हें 21 फरवरी, 2025 को अस्पताल में भर्ती कराया गया था।
भारतीय सिनेमा में मनोज कुमार के योगदान को हमेशा याद रखा जाएगा। उन्हें कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया था। उनके नाम एक राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और अलग-अलग श्रेणियों में सात फिल्मफेयर पुरस्कार शामिल हैं। भारतीय कला में उनके अपार योगदान के सम्मान में सरकार ने उन्हें 1992 में पद्म श्री से सम्मानित किया। उन्हें 2015 में दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
मेरे देश की धरती… हर जुबां पर चढ़ा


