Monday, April 20, 2026
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केंद्र सरकार ने 24 नए चिप डिजाइन प्रोजेक्ट्स को दी मंजूरी, ड्रोन से लेकर सैटेलाइट तक में होगा इस्तेमाल

केंद्र सरकार ने डिजाइन लिंक्ड इंसेंटिव स्कीम (डीएलआई) के तहत भारतीय सेमीकंडक्टर यानी चिप बनाने वाले उद्योग को मजबूत करने के लिए 24 नए चिप डिजाइन प्रोजेक्ट्स को मंजूरी दी है। ये प्रोजेक्ट्स वीडियो निगरानी, ड्रोन का पता लगाने, एनर्जी मीटर, माइक्रोप्रोसेसर, सैटेलाइट कम्युनिकेशन, ब्रॉडबैंड और आईओटी सिस्टम-ऑन-चिप्स (एसओसी) जैसे क्षेत्रों में हैं। रविवार को जारी एक आधिकारिक बयान में यह जानकारी साझा की गई है।

बयान में कहा गया है कि इसके अलावा, 95 कंपनियों को उद्योग स्तरीय इलेक्ट्रॉनिक डिजाइन ऑटोमेशन (ईडीए) टूल्स तक पहुंच दी गई है। इससे चिप डिजाइन स्टार्टअप्स का खर्च कम होगा और उन्हें बेहतर उपकरण मिलेंगे।

सेमीकंडक्टर चिप डिजाइन चिप बनाने की प्रक्रिया में सबसे ज्यादा मूल्य जोड़ने वाला हिस्सा है। यह आपूर्ति श्रृंखला में 50 प्रतिशत और फैबलेस सेगमेंट के माध्यम से वैश्विक सेमीकंडक्टर बिक्री में 30-35 प्रतिशत का योगदान देता है।

बयान में कहा गया कि डिजाइन लिंक्ड इंसेंटिव (डीएलआई) समर्थित योजनाएं तेजी से आगे बढ़ रही हैं। स्कीम के तहत अब तक 16 टेप-आउट, 6 एएसआईसी चिप्स, 10 पेटेंट और 1,000 से ज्यादा इंजीनियर शामिल हो चुके हैं। साथ ही निजी निवेश भी तीन गुना तक बढ़ा है।

डीएलआई स्कीम को इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय चला रहा है। इस योजना का बजट 76,000 करोड़ रुपए है। यह योजना सेमीकंडक्टर और डिस्प्ले निर्माण के साथ-साथ चिप डिजाइन सिस्टम को भी समर्थन देती है।

डीएलआई स्कीम स्टार्टअप्स और एमएसएमई को डिजाइन से लेकर प्रोडक्ट बनाने तक पूरी मदद देती है। योजना का उद्देश्य भारत के घरेलू सेमीकंडक्टर डिजाइन उद्योग में मौजूद कमियों को दूर करना है। इसका लक्ष्य भारतीय सेमीकंडक्टर उद्योग को मजबूत और आत्मनिर्भर बनाना है।

इसके अलावा, चिप्स टू स्टार्टअप (सी2एस) प्रोग्राम के जरिए देशभर की शिक्षण संस्थाओं में 85,000 इंजीनियर, मास्टर्स और पीएचडी स्तर के छात्र तैयार किए जा रहे हैं, जो चिप डिजाइन में विशेषज्ञता प्राप्त करेंगे।

बयान में कहा गया है कि मजबूत ‘फैबलेस क्षमता’ यानी ‘खुद की डिजाइन और तकनीक वाली क्षमता’ के बिना देश विदेशी तकनीक पर निर्भर रहता है। ऐसे में, इस स्कीम से भारत अपने तकनीकी ज्ञान और उत्पादन में आत्मनिर्भर बन सकेगा, आयात कम होगा और भविष्य में तकनीकी नेतृत्व हासिल होगा।

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