Thursday, May 28, 2026
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वोटर लिस्ट से हटाए संदिग्ध नागरिकों की सूची गृह मंत्रालय को भेजें’… SC का चुनाव आयोग को आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को सही ठहराते हुए बुधवार को अहम फैसला सुनाया। शीर्ष अदालत ने चुनाव आयोग (EC) को निर्देश दिया कि संदिग्ध नागरिकता के आधार पर वोटर लिस्ट से हटाए गए लोगों की सूची चार सप्ताह के भीतर गृह मंत्रालय को भेजी जाए, ताकि नागरिकता अधिनियम, 1955 के तहत उनकी नागरिकता पर फैसला लिया जा सके।

चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा, “संबंधित सक्षम प्राधिकारी कानून के अनुसार निर्णय लेगा। यह प्रक्रिया अगली लोकसभा, विधानसभा या स्थानीय निकाय चुनावों से पहले पूरी होना बेहतर होगा।” अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जिन लोगों के नाम हटाए गए हैं, उन्हें नोटिस देकर अपनी बात रखने का पूरा अवसर दिया जाएगा।

भारतीय नागरिक पाए जाने पर नाम फिर जुड़ेंगे

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जांच में यदि कोई व्यक्ति भारतीय नागरिक पाया जाता है, तो उसका नाम दोबारा वोटर लिस्ट में शामिल किया जाएगा। अदालत ने बिहार में SIR प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए कहा कि यह प्रक्रिया 23 साल बाद की जा रही है और इसका उद्देश्य वोटर लिस्ट में मौजूद गंभीर विसंगतियों को दूर करना है। बेंच ने माना कि इतनी व्यापक प्रक्रिया में पर्याप्त सुरक्षा उपाय शामिल किए गए हैं, इसलिए इसे मनमाना नहीं कहा जा सकता।

दस्तावेजों की मांग को बताया तार्किक

वोटर सत्यापन के दौरान मांगे जा रहे दस्तावेजों पर उठे सवालों को भी सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि दस्तावेजों का वर्गीकरण स्पष्ट और तार्किक आधार पर किया गया है, जिसका मकसद वोटर लिस्ट की शुद्धता और विश्वसनीयता बनाए रखना है। हालांकि, अदालत ने चुनाव आयोग को सावधानी बरतने की सलाह भी दी। कोर्ट ने कहा कि पहले से वोटर लिस्ट में दर्ज नामों के साथ हल्के तरीके से छेड़छाड़ नहीं की जानी चाहिए और किसी भी संशोधन की प्रक्रिया कानून के तहत तय नियमों के अनुसार ही पूरी होनी चाहिए।

‘लोकतंत्र सिर्फ मतदान नहीं, मतदाता की पहचान भी’

सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ने कहा, “वैधता की धारणा बेहद महत्वपूर्ण है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि वोटर लिस्ट में दर्ज नामों को बिना ठोस आधार और उचित प्रक्रिया के न हटाया जाए।”उन्होंने राजनीतिक वैज्ञानिक बर्नार्ड मैनिन का हवाला देते हुए कहा, “किसी भी प्रतिनिधि सरकार के लिए वोटों की गिनती से पहले यह तय करना जरूरी है कि वोट देने का अधिकार किन लोगों को है। लोकतंत्र केवल मतदान की प्रक्रिया नहीं, बल्कि उन लोगों की पहचान की प्रक्रिया भी है जिन्हें सरकार चुनने में भाग लेने का अधिकार प्राप्त है।”

अदालत ने आगे कहा कि वोटर लिस्ट किसी भी राजनीतिक समुदाय का कानूनी रिकॉर्ड होती है, इसलिए इससे जुड़े विवाद केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था और प्रतिनिधि सरकार की बुनियाद से जुड़े होते हैं।

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