Friday, July 3, 2026
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महाराष्ट्र में बायोप्लास्टिक इंडस्ट्री को बड़ा बूस्ट, 25,000 करोड़ निवेश का लक्ष्य तय

प्लास्टिक प्रदूषण पर अंकुश लगाने और महाराष्ट्र को हरित विनिर्माण (ग्रीन मैन्युफैक्चरिंग) का प्रमुख केंद्र बनाने की दिशा में महायुति सरकार ने ‘महाराष्ट्र बायोप्लास्टिक्स पॉलिसी-2026’ को मंजूरी दे दी है। इस नीति के तहत बायोप्लास्टिक्स विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए प्रोत्साहन (इंसेंटिव) और विशेष वित्तीय सहायता का व्यापक पैकेज उपलब्ध कराया जाएगा।

 

यह नीति वर्ष 2026 से 2031 तक प्रभावी रहेगी। सरकार का लक्ष्य महाराष्ट्र को बायोप्लास्टिक्स के उत्पादन, अनुसंधान, नवाचार और निर्यात का राष्ट्रीय केंद्र बनाना है। सरकार को उम्मीद है कि इस पहल से 25,000 करोड़ रुपये का निवेश आकर्षित होगा, 1.31 लाख प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार सृजित होंगे और 30,039 करोड़ रुपये के राजस्व का सृजन होगा।

नीति के तहत प्रतिवर्ष 2 लाख टन पीएलए (पॉलीलैक्टिक एसिड) और अन्य बायोपॉलिमर उत्पादन क्षमता विकसित करने का लक्ष्य रखा गया है। इसके साथ ही राज्य की आयातित पीएलए पर निर्भरता में 50 प्रतिशत की कमी लाने की योजना है।

सरकार ने चुनिंदा क्षेत्रों में सिंगल-यूज प्लास्टिक के 30 प्रतिशत उपयोग को कम्पोस्टेबल विकल्पों से बदलने, 1 अरब डॉलर के निर्यात और 1 लाख किसानों को बायोप्लास्टिक्स वैल्यू चेन से जोड़ने का भी लक्ष्य निर्धारित किया है।

राज्य मंत्रिमंडल ने इस नीति के लिए 10,892 करोड़ रुपये के कुल परिव्यय को मंजूरी दी है। इसमें पहले पांच वर्षों के दौरान 782 करोड़ रुपये तथा अगले 20 वर्षों में 10,110 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे। वहीं, वर्ष 2026-27 के लिए पैकेज स्कीम ऑफ इंसेंटिव्स के तहत 50 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।

सरकारी सूत्रों के अनुसार, पारंपरिक प्लास्टिक कचरे, माइक्रोप्लास्टिक्स, समुद्री प्रदूषण और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को लेकर बढ़ती चिंताओं के मद्देनजर जैव-आधारित और जैव-अपघटनीय (बायोडिग्रेडेबल) विकल्पों को बढ़ावा देने के लिए इस नीति की जरूरत महसूस की गई। वैश्विक स्तर पर बायोप्लास्टिक्स बाजार तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन भारत की हिस्सेदारी अभी केवल 0.46 प्रतिशत है और देश अब भी पॉलीलैक्टिक एसिड (पीएलए) जैसे प्रमुख बायोपॉलिमर के आयात पर काफी हद तक निर्भर है।

महाराष्ट्र गन्ना, चीनी और एथेनॉल उत्पादन में अग्रणी राज्यों में शामिल है, जिससे मक्का, बैगास और शीरे जैसे कच्चे माल की पर्याप्त उपलब्धता है। इसके अलावा राज्य का मजबूत रासायनिक उद्योग, प्रमुख अनुसंधान संस्थान और जवाहरलाल नेहरू पोर्ट अथॉरिटी (जेएनपीए) के नेतृत्व वाला लॉजिस्टिक्स नेटवर्क इसे बायोप्लास्टिक्स उद्योग के लिए अनुकूल बनाता है। वर्ष 2022-23 के दौरान महाराष्ट्र में करीब 3.96 लाख टन प्लास्टिक कचरा उत्पन्न हुआ था, जिसने इस दिशा में कदम उठाने की आवश्यकता को और बढ़ा दिया।

नई नीति में कच्चे माल के प्रसंस्करण से लेकर पीएलए, पीएचए, पीबीएस और अन्य बायोपॉलिमर के उत्पादन, कंपाउंडिंग, तैयार उत्पादों के निर्माण, परीक्षण प्रयोगशालाओं, कम्पोस्टिंग और प्रमाणन सेवाओं तक पूरी वैल्यू चेन को शामिल किया गया है। सभी पात्र इकाइयों के लिए बीआईएस/आईएसओ 17088 अथवा केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा मान्यता प्राप्त समकक्ष मानकों का प्रमाणन अनिवार्य होगा।

नीति के प्रमुख फोकस क्षेत्रों में मानकीकरण और प्रमाणन, क्लस्टर आधारित औद्योगिक पार्क, कॉमन फैसिलिटी सेंटर, अनुसंधान एवं उत्कृष्टता केंद्र, कौशल विकास, एमएसएमई और स्टार्टअप को प्रोत्साहन, महिलाओं और ग्रामीण युवाओं की भागीदारी बढ़ाना तथा विदेशी निवेश और निर्यात को बढ़ावा देना शामिल है। सरकार नवाचार और प्रौद्योगिकी विकास को गति देने के लिए दो उत्कृष्टता केंद्र (सेंटर ऑफ एक्सीलेंस) भी स्थापित करेगी। केवल नई (ग्रीनफील्ड) परियोजनाओं और बायोप्लास्टिक्स के लिए समर्पित ब्राउनफील्ड विस्तार परियोजनाओं को ही इस नीति का लाभ मिलेगा।

बड़े निवेश आकर्षित करने के लिए सरकार चरणबद्ध प्रोत्साहन व्यवस्था लागू करेगी। 3,000 करोड़ रुपये या उससे अधिक निवेश वाली पहली दो एंकर परियोजनाओं को विशेष लाभ दिए जाएंगे। इन्हें 10 वर्षों में स्थिर पूंजी निवेश पर 30 प्रतिशत तक पूंजी सब्सिडी, 12 वर्षों तक 100 प्रतिशत एसजीएसटी प्रतिपूर्ति, बिजली शुल्क में पूर्ण छूट और स्टांप शुल्क में राहत सहित कई अन्य प्रोत्साहन दिए जाएंगे।

इसी तरह के लाभ पहले 10 पात्र बड़े, मेगा और एमएसएमई उद्योगों को भी उपलब्ध होंगे। स्वतंत्र अनुसंधान एवं विकास (आरएंडडी) केंद्रों को 50 प्रतिशत तक वित्तीय सहायता दी जाएगी, जिसकी अधिकतम सीमा 25 लाख रुपये होगी।

इसके अलावा, शून्य तरल अपशिष्ट (जीरो लिक्विड डिस्चार्ज) प्रणाली, नवीकरणीय ऊर्जा और सर्कुलर इकोनॉमी आधारित तकनीकों को अपनाने वाली इकाइयों को अतिरिक्त ‘ग्रीन इंसेंटिव’ दिया जाएगा। सरकार का मानना है कि इससे महाराष्ट्र देश में टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल विनिर्माण का अग्रणी केंद्र बन सकेगा।

 

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