देश भर की निचली अदालतों में जज बनने का सपना संजो रहे लाखों युवाओं और लॉ ग्रेजुएट्स के लिए सुप्रीम कोर्ट से एक बेहद बड़ी और राहत भरी खबर सामने आई है। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने एक अहम फैसले में संशोधन करते हुए एंट्री-लेवल न्यायिक सेवा परीक्षा के नियमों में बड़ा बदलाव कर दिया है। कोर्ट ने परीक्षा में बैठने के लिए वकालत के अनुभव की सीमा को काफी कम कर दिया है, जिससे न्यायिक सेवाओं की तैयारी कर रहे छात्रों के बीच खुशी की लहर दौड़ गई है।
3 साल की जगह अब सिर्फ 1 साल का अनुभव हुआ जरूरी
चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस ए.जी. मसीह और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने इस अहम मामले की सुनवाई करते हुए 2-1 के बहुमत से यह ऐतिहासिक फैसला सुनाया। इस नए आदेश के तहत, अब न्यायिक परीक्षा में बैठने के लिए उम्मीदवारों के पास तीन साल के बजाय केवल एक साल का वकालत का अनुभव होना अनिवार्य होगा। कोर्ट ने माना कि मई 2025 में अचानक लागू किए गए तीन साल की प्रैक्टिस के नियम से बिना किसी ट्रांजिशन पीरियड के नए लॉ ग्रेजुएट्स और युवा वकीलों के सामने भारी मुश्किलें खड़ी हो गई थीं, जिसके चलते यह बड़ी राहत दी गई है।
बिना अनुभव वाले भी दे सकेंगे परीक्षा, लेकिन रहेगी यह खास शर्त
सुप्रीम कोर्ट ने युवाओं की परेशानी को समझते हुए एक विशेष छूट का भी ऐलान किया है। कोर्ट के आदेशानुसार, 25 मई 2025 से 31 मार्च 2027 के बीच जारी होने वाले न्यायिक परीक्षाओं के नोटिफिकेशन के लिए अनुभव की कोई अनिवार्यता लागू नहीं होगी। यानी इस अवधि में बिना वकालत के अनुभव वाले उम्मीदवार भी आसानी से परीक्षा दे सकेंगे। हालांकि, अदालत ने यह शर्त रखी है कि इस छूट के तहत चुने गए उम्मीदवारों को सीधे जज की कुर्सी पर नहीं बैठाया जाएगा। उन्हें पहले एक साल के लिए ट्रेनी ज्यूडिशियल ऑफिसर के रूप में काम करना होगा और एक साल की कड़ी स्ट्रक्चर्ड क्लर्कशिप से गुजरना होगा।
1 अप्रैल 2027 से पूरी तरह से लागू हो जाएगा नया नियम
सर्वोच्च न्यायालय ने भविष्य की परीक्षाओं की स्थिति भी बिल्कुल साफ कर दी है। अदालत के अनुसार, 1 अप्रैल 2027 या उसके बाद जारी होने वाली सभी न्यायिक परीक्षाओं के नोटिफिकेशन पर एक साल के अनुभव वाला यह नया और संशोधित नियम पूरी तरह से लागू हो जाएगा। गौरतलब है कि मई 2025 में कोर्ट ने फ्रेश लॉ ग्रेजुएट्स के सीधे जज बनने पर रोक लगाते हुए तीन साल की प्रैक्टिस को अनिवार्य कर दिया था। इसके बाद इस फैसले के खिलाफ कई पुनर्विचार याचिकाएं दाखिल की गई थीं, जिन पर अब सुनवाई करते हुए कोर्ट ने युवाओं के हक में यह बड़ा और अहम फैसला सुनाया है।


