नेपाल में बुधवार को आई भीषण बाढ़ ने भारी तबाही मचाई है। गांव के गांव जलप्रलय में बह गए और 150 से अधिक लोगों की मौत की खबर है, जबकि सैकड़ों लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं। पड़ोसी देश में आई इस आपदा ने भारत की चिंता भी बढ़ा दी है। विशेषज्ञों की नजर अब चीन के तिब्बत में बन रहे विशाल **मेडॉग हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट** पर है। आशंका जताई जा रही है कि भूकंप या किसी प्राकृतिक आपदा की स्थिति में इस परियोजना से अचानक भारी मात्रा में पानी नीचे की ओर आने पर भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में बड़ा संकट पैदा हो सकता है।
चीन अरुणाचल प्रदेश की सीमा के करीब ब्रह्मपुत्र नदी पर करीब 60,000 मेगावाट क्षमता का मेडॉग हाइड्रोपावर स्टेशन बना रहा है। यह क्षेत्र भूकंपीय दृष्टि से बेहद संवेदनशील माना जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि बड़े भूकंप या भूस्खलन की स्थिति में बांध और उसके आसपास की संरचनाओं पर दबाव पड़ सकता है और भारी मात्रा में पानी नीचे की ओर छोड़ा जा सकता है।
सामरिक मामलों के विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलानी ने इसे लेकर चिंता जताई है। उनके मुताबिक, हिमालय के भूकंपीय क्षेत्र में दुनिया का सबसे बड़ा बांध बनाना गंभीर जोखिम पैदा कर सकता है। उन्होंने आशंका जताई कि किसी बड़ी प्राकृतिक आपदा की स्थिति में इसका असर पूर्वोत्तर भारत से लेकर बांग्लादेश तक पड़ सकता है।
पूर्व भारतीय राजदूत राजीव डोगरा ने भी सोशल मीडिया पर इस परियोजना को लेकर चिंता जताते हुए कहा कि यदि चीन ने 60,000 मेगावाट की यह परियोजना पूरी कर ली तो उत्तर-पूर्वी भारत में नेपाल से भी बड़ी त्रासदी की आशंका पैदा हो सकती है।
मेडॉग परियोजना को लेकर चीनी सरकारी सर्वेक्षण से जुड़े भूवैज्ञानिकों की एक स्टडी का भी हवाला दिया जा रहा है। जुलाई में ‘सेडिमेंट्री जियोलॉजी एंड टेथियन जियोलॉजी’ जर्नल में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक, परियोजना स्थल के नीचे ‘पेइज़ेन फॉल्ट’ नाम की सक्रिय भूकंपीय रेखा मौजूद है।
हिमालय दुनिया की सबसे सक्रिय भूकंपीय पर्वतमालाओं में से एक है। ऐसे क्षेत्रों में भूकंप से भूस्खलन, चट्टानों के टूटने और अचानक बाढ़ जैसी घटनाओं का खतरा बढ़ जाता है। नेपाल में हालिया बाढ़ के पीछे भी शुरुआती जांच में ग्लेशियर और चट्टानों के टूटने को संभावित कारण माना जा रहा है।
चीन ब्रह्मपुत्र नदी पर यह परियोजना बना रहा है, जिसे तिब्बत में यारलुंग त्सांगपो कहा जाता है। तिब्बत से बहने वाली यह नदी अरुणाचल प्रदेश में सिआंग के नाम से भारत में प्रवेश करती है और आगे असम में ब्रह्मपुत्र कहलाती है।
भारत की चिंता सिर्फ पानी रोकने को लेकर नहीं है, बल्कि नदी के बहाव पर चीन के बढ़ते नियंत्रण को लेकर भी है। विशेषज्ञों के मुताबिक, भारी बारिश के दौरान यदि अचानक बड़ी मात्रा में पानी छोड़ा जाता है तो अरुणाचल प्रदेश और असम में बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है। वहीं, सूखे के समय पानी का प्रवाह कम होने से कृषि और स्थानीय आबादी प्रभावित हो सकती है।
भारत और चीन के बीच नदी के पानी से जुड़ी कोई व्यापक बाध्यकारी जल-साझाकरण संधि नहीं है। ऐसे में चीन की ओर से नदी के जलस्तर और बांध से पानी छोड़ने संबंधी सूचनाओं को लेकर पारदर्शिता भारत के लिए अहम मुद्दा बनी हुई है। अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू भी चीन की इस परियोजना को राज्य के लिए ‘अस्तित्व का खतरा’ बता चुके हैं।
नेपाल में आई हालिया बाढ़ के दौरान चीन की ओर से कथित तौर पर पूर्व चेतावनी नहीं दिए जाने को लेकर भी सवाल उठे हैं। काठमांडू के पत्रकार परशुराम काफ्ले ने सोशल मीडिया पर दावा किया कि तिब्बत की ओर से आने वाले भारी जलप्रवाह को लेकर नेपाल सरकार को समय रहते जानकारी नहीं दी गई। हालांकि, इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है।
अमेरिकी-तिब्बती वकील तेनजिन त्सरिंग ने आशंका जताई है कि चीन भविष्य में भारत के साथ भी इसी तरह का रवैया अपना सकता है। चीन की परियोजना के जवाब में भारत अरुणाचल प्रदेश में सिआंग नदी पर करीब 11,000 मेगावाट के सिआंग अपर मल्टीपर्पज प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है। इसे रणनीतिक और बाढ़ प्रबंधन की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, भविष्य में यदि चीन की ओर से अचानक भारी मात्रा में पानी छोड़ा जाता है तो भारत में बड़े जलाशय की क्षमता पानी के बहाव को नियंत्रित करने में मदद कर सकती है। हालांकि, किसी भी बांध को बाढ़ से पूरी तरह सुरक्षा की गारंटी मानना उचित नहीं होगा।
नेपाल की हालिया आपदा ने एक बार फिर हिमालयी क्षेत्र में बड़े बांधों, भूकंपीय गतिविधियों और सीमा पार नदियों के प्रबंधन से जुड़े जोखिमों को सामने ला दिया है। ऐसे में भारत के लिए समय पर जल-डेटा साझा करना, पूर्व चेतावनी प्रणाली मजबूत करना और पूर्वोत्तर राज्यों की आपदा तैयारी बढ़ाना बेहद महत्वपूर्ण हो गया है।


