Monday, November 2, 2026
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प्रोडक्ट ₹11 का और MRP ₹325…बीमारी में मजबूरी का ऐसा फायदा? तुकाराम मुंढे ने खोली निजी अस्पतालों की पोल

अस्पताल में भर्ती मरीज और उसके तीमारदारों के लिए सबसे बड़ा तनाव इलाज के अंत में थमाया जाने वाला भारी-भरकम बिल होता है। अब इस मेडिकल बिलिंग के खेल को लेकर एक बेहद चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। महाराष्ट्र फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (FDA) द्वारा अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाले मेडिकल कंज्यूमेबल्स की कीमतों पर किए गए एक गोपनीय सर्वे में खरीद दर (ट्रेड प्राइस) और उस पर छपे अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) के बीच कई गुना का भारी अंतर सामने आया है। इस खेल के जरिए मरीजों की जेब पर सीधे तौर पर डाका डाला जा रहा है।

₹11 का सामान ₹325 में, सिरिंज और कैथेटर पर भी अंधाधुंध मुनाफा
महाराष्ट्र एफडीए के प्रमुख तुकाराम मुंढे ने सोशल मीडिया पर इस सर्वे से जुड़े चौंकाने वाले आंकड़े साझा करते हुए सिस्टम की खामियों को उजागर किया है। सर्वे के मुताबिक, जो IV इन्फ्यूजन सेट अस्पताल मात्र ₹11.05 की थोक दर पर खरीदते हैं, उस पर ₹325 की एमआरपी प्रिंट कर मरीजों से पूरी रकम वसूली जाती है। इसी तरह ₹6.75 की लागत वाली सामान्य सिरिंज पर ₹57.20 और ₹29.41 की लागत वाले कैथेटर पर ₹310 का एमआरपी दर्ज पाया गया। यानी जीवनरक्षक और बुनियादी मेडिकल सामानों पर मरीजों से लागत से दस से तीस गुना तक ज्यादा कीमत वसूली जा रही है।

मजबूर मरीज के पास विकल्प नहीं, चुपचाप चुकानी पड़ती है कीमत
तुकाराम मुंढे ने इस गंभीर विसंगति पर चिंता जताते हुए कहा कि अस्पताल में गंभीर हालत में भर्ती मरीज इन जरूरी सामानों को टाल नहीं सकता। नसों के जरिए दवा चढ़ाने वाला आईवी सेट, सिरिंज और कैथेटर जैसी चीजें इलाज के दौरान अनिवार्य होती हैं। आपात स्थिति में न तो मरीज या उसके परिजनों के पास बाजार में कीमतों की तुलना करने का मौका होता है और न ही वे बीच इलाज में कोई दूसरा विकल्प चुन सकते हैं। अस्पताल इसी लाचारी का फायदा उठाते हैं और मरीज कभी जान ही नहीं पाता कि जिस सामान की वह भारी कीमत चुका रहा है, उसकी वास्तविक लागत कितनी कम है।

ड्रग्स प्राइस कंट्रोल के दायरे से बाहर हैं मेडिकल कंज्यूमेबल्स
मौजूदा रेगुलेटरी सिस्टम की खामियों पर प्रहार करते हुए एफडीए कमिश्नर ने बताया कि ड्रग्स प्राइस कंट्रोल ऑर्डर (DPCO) 2013 के तहत आवश्यक दवाओं पर तो मूल्य नियंत्रण (प्राइस सीलिंग) लागू है, लेकिन अधिकांश मेडिकल डिवाइसेज और कंज्यूमेबल्स इस सीधे नियंत्रण के दायरे में नहीं आते। इसका फायदा उठाकर निर्माता और डिस्ट्रीब्यूटर पहले से ही उत्पादों पर अवास्तविक रूप से अत्यधिक एमआरपी छाप देते हैं, जिससे अस्पतालों को भारी कमीशन और मुनाफा कमाने की खुली छूट मिल जाती है।

केंद्र सरकार और NPPA को भेजी गई सख्त सिफारिश
मरीजों को इस संस्थागत लूट से बचाने के लिए महाराष्ट्र एफडीए ने केंद्रीय रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय के फार्मास्यूटिकल्स विभाग और नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (NPPA) को इस सर्वे रिपोर्ट के साथ कड़े कदम उठाने की सिफारिश भेजी है। एफडीए ने मांग की है कि मेडिकल सामानों के ट्रेड प्रोक्योरमेंट प्राइस और प्रिंटेड एमआरपी के बीच एक उचित और पारदर्शी अंतर तय करने के लिए तुरंत स्पष्ट राष्ट्रीय गाइडलाइन बनाई जाए, ताकि निजी अस्पतालों में इलाज करा रहे आम नागरिकों का आर्थिक शोषण पूरी तरह बंद हो सके।

 

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