Monday, November 2, 2026
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विश्वकर्मा जयंती 2026: कैसे शुरू हुई विश्वकर्मा पूजा की परंपरा? जानें भगवान विश्वकर्मा के जन्म और पौराणिक कथा की कहानी

हिंदू धर्म में भगवान विश्वकर्मा को निर्माण, शिल्प, वास्तुकला और तकनीकी कला का देवता माना जाता है। हर साल विश्वकर्मा पूजा के अवसर पर कारीगर, शिल्पकार, इंजीनियर, मजदूर, कारोबारी और औद्योगिक संस्थानों से जुड़े लोग भगवान विश्वकर्मा की आराधना करते हैं।

विश्वकर्मा पूजा की परंपरा सूर्य के कन्या राशि में प्रवेश करने से जुड़ी मानी जाती है। इस अवसर को कन्या संक्रांति कहा जाता है। इसी दिन भगवान विश्वकर्मा की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित कर विधि-विधान से पूजा की जाती है। कारखानों, फैक्ट्रियों, दुकानों और औद्योगिक संस्थानों में विशेष आयोजन किए जाते हैं। पूजा के बाद औजारों और मशीनों को भी सम्मानपूर्वक पूजा जाता है। इस दिन मशीनों, औजारों, वाहनों और कार्यस्थल में इस्तेमाल होने वाले उपकरणों की साफ-सफाई कर उनकी पूजा की जाती है। मान्यता है कि भगवान विश्वकर्मा की पूजा करने से कार्य में कुशलता, उन्नति और सफलता का आशीर्वाद मिलता है।

कई परंपराओं में विश्वकर्मा पूजा को भगवान विश्वकर्मा के प्राकट्य या जन्म से भी जोड़ा जाता है। हालांकि अलग-अलग धार्मिक ग्रंथों और परंपराओं में उनकी उत्पत्ति को लेकर अलग-अलग विवरण मिलते हैं।

पौराणिक मान्यता के अनुसार, सृष्टि के प्रारंभ में भगवान विष्णु क्षीर सागर में शेषनाग की शय्या पर विराजमान थे। उनकी नाभि से कमल प्रकट हुआ और इसी कमल से चार मुख वाले ब्रह्मा जी का प्राकट्य हुआ। भगवान ब्रह्मा से जुड़े वंशक्रम में वास्तुदेव का उल्लेख मिलता है। वास्तुदेव का विवाह अंगिरसी से हुआ और उनसे ऋषि विश्वकर्मा का जन्म माना जाता है।

मान्यता है कि विश्वकर्मा ने अपने पिता वास्तुदेव से वास्तुकला और निर्माण की विद्या प्राप्त की। आगे चलकर वे शिल्प एवं वास्तुकला के महान आचार्य बने। इसी कारण उन्हें देवताओं के दिव्य भवनों और विभिन्न अद्भुत निर्माणों का निर्माता माना गया।

पौराणिक कथाओं में भगवान विश्वकर्मा को कई महत्वपूर्ण दिव्य निर्माणों का श्रेय दिया जाता है। मान्यता है कि उन्होंने भगवान विष्णु का सुदर्शन चक्र, भगवान शिव का त्रिशूल और इंद्र का वज्र जैसे दिव्य अस्त्र तैयार किए थे। इसके अलावा, भगवान कृष्ण की द्वारिका नगरी और पांडवों की इंद्रप्रस्थ नगरी के निर्माण का संबंध भी विश्वकर्मा से जोड़ा जाता है।

पौराणिक कथाओं में पुष्पक विमान और सोने की लंका के निर्माण का उल्लेख भी मिलता है। एक कथा के अनुसार, भगवान शिव के लिए स्वर्ण महल का निर्माण विश्वकर्मा ने किया था। महल की पूजा के बाद रावण ने दक्षिणा के रूप में उसी महल को मांग लिया और उसे अपने अधिकार में ले लिया। इसी वजह से स्वर्ण लंका की कथा भी विश्वकर्मा से जुड़ी मानी जाती है।

प्राचीन समय में शिल्पकारों और निर्माण कार्य से जुड़े लोगों के बीच भगवान विश्वकर्मा की पूजा की परंपरा रही। समय के साथ यह परंपरा बढ़कर कारखानों, कंपनियों, दुकानों और विभिन्न तकनीकी क्षेत्रों तक पहुंच गई। आज विश्वकर्मा पूजा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि श्रम, कौशल, तकनीक और निर्माण कार्य के प्रति सम्मान का प्रतीक भी मानी जाती है।

 

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