गंभीर और दुर्लभ बीमारी से जूझ रहे एक 22 महीने के मासूम बच्चे के लिए उद्योगपति मुकेश अंबानी के छोटे बेटे अनंत अंबानी फरिश्ता बनकर सामने आए हैं। महाराष्ट्र का नन्हा वेदांश ‘स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी’ (SMA) नामक एक जानलेवा न्यूरोमस्कुलर बीमारी से जिंदगी और मौत की जंग लड़ रहा है, जिसके इलाज और दवा का खर्च करीब 10 करोड़ रुपये है। एक साधारण परिवार के लिए इतनी विशाल रकम जुटाना असंभव था, लेकिन लालबागचा राजा के दर्शन कर लौट रहे अनंत अंबानी ने जब बच्चे की मदद का बैनर देखा, तो उन्होंने तुरंत अपनी गाड़ी रुकवाई और मासूम के इलाज का पूरा खर्च उठाने का बड़ा ऐलान कर दिया।
सुबह 5 बजे लालबागचा राजा के गेट पर देखा बैनर, खुद रुकवाई कार
मिड-डे मुंबई की रिपोर्ट के अनुसार, सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर मयूरेश गुजर और उनकी टीम मासूम वेदांश की जिंदगी बचाने के लिए पिछले करीब एक महीने से क्राउडफंडिंग के जरिए मदद जुटाने में लगी हुई थी। टीम के सदस्य हाथों में डोनेशन का बैनर लेकर सड़कों, मंदिरों और सार्वजनिक आयोजनों के बाहर खड़े होकर लोगों से एक-एक रुपये की मदद मांग रहे थे।
20 सितंबर की रात 10 बजे से मयूरेश और उनके साथी मुंबई के प्रसिद्ध ‘लालबागचा राजा’ पंडाल के गेट के पास बैनर लेकर खड़े थे। 21 सितंबर की तड़के करीब 5:18 बजे अनंत अंबानी बप्पा के दर्शन करने के बाद वहां से अपनी गाड़ी में लौट रहे थे। अचानक उनकी नजर सड़क किनारे खड़े युवाओं के हाथ में मौजूद डोनेशन बैनर पर पड़ी। उन्होंने बिना देर किए अपनी गाड़ी वहीं रुकवा ली।
5 मिनट तक सुनी बच्चे की दास्तां, तुरंत दिया मदद का भरोसा
गाड़ी रुकते ही मयूरेश गुजर ने आगे बढ़कर करीब 4 से 5 मिनट के भीतर अनंत अंबानी को मासूम वेदांश की दुर्लभ बीमारी, उसके शरीर पर हो रहे घातक असर और 10 करोड़ रुपये के महंगे इलाज की गंभीरता से पूरी तरह अवगत कराया। मामले की नजाकत और बच्चे की मासूमियत को देखते हुए अनंत अंबानी ने तुरंत संवेदनशीलता दिखाई और भरोसा दिलाया कि वेदांश के इलाज का पूरा खर्च वे खुद उठाएंगे। अनंत अंबानी के इस दरियादिली भरे फैसले के बाद बच्चे के माता-पिता और इस नेक मुहिम में जुटे युवाओं की आंखों से खुशी के आंसू छलक पड़े।
क्या है स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी (SMA) और इसके लक्षण
स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी (SMA) एक दुर्लभ और जानलेवा जेनेटिक न्यूरोमस्कुलर बीमारी है। यह बीमारी SMN1 जीन में म्यूटेशन (खराबी) आने की वजह से होती है। इस खराबी के चलते शरीर में ‘SMN प्रोटीन’ पर्याप्त मात्रा में नहीं बन पाता, जो रीढ़ की हड्डी में मांसपेशियों को नियंत्रित करने वाली मोटर न्यूरॉन्स कोशिकाओं के जिंदा रहने के लिए बेहद जरूरी है। इसके अभाव में कोशिकाएं धीरे-धीरे खत्म होने लगती हैं, जिससे मांसपेशियां पूरी तरह शिथिल पड़ जाती हैं।
इस गंभीर बीमारी से पीड़ित बच्चे में अत्यधिक शारीरिक कमजोरी, शरीर का ढीला पड़ना, बैठने, खड़े होने या चलने में असमर्थता, संतुलन खोना और आगे चलकर भोजन निगलने व सांस लेने में गंभीर तकलीफ जैसे खतरनाक लक्षण दिखाई देने लगते हैं।
आखिर करोड़ों में क्यों बिकती हैं इस बीमारी की दवाएं
एसएमए का इलाज दुनिया के सबसे महंगे मेडिकल ट्रीटमेंट्स में शुमार है। इसके उपचार के लिए विकसित की गई दवाएं अत्याधुनिक ‘जीन थेरेपी’ पर आधारित होती हैं, जो सीधे मरीज के डीएनए स्तर पर काम करती हैं। इस तरह की अत्याधुनिक जीन थेरेपी को विकसित करने और क्लीनिकल ट्रायल में वर्षों का समय और अरबों डॉलर का भारी-भरकम रिसर्च बजट खर्च होता है। चूंकि दुनिया भर में इस दुर्लभ बीमारी के बहुत ही गिने-चुने मामले सामने आते हैं, इसलिए इन विशेष दवाओं का उत्पादन भी बहुत सीमित पैमाने पर होता है। बड़े पैमाने पर उत्पादन न होने और भारी रिसर्च लागत की भरपाई के कारण इस एक इंजेक्शन की कीमत करोड़ों रुपये तक पहुंच जाती है।


