इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी महिला के अवैध संबंध उसके विधवा होने के कानूनी दर्जे को समाप्त नहीं करते। अदालत ने यह भी कहा कि वैध विवाह के दौरान जन्मे बच्चे की वैधता पर केवल मां के किसी अन्य व्यक्ति से संबंध होने का आरोप लगाकर सवाल नहीं उठाया जा सकता।
न्यायमूर्ति अनिल कुमार की पीठ ने बलिया की एक महिला की प्रथम अपील स्वीकार करते हुए अपर जिला जज-द्वितीय, बलिया के उस फैसले और डिक्री को रद्द कर दिया, जिसमें महिला के खिलाफ वाद डिक्री किया गया था। हाईकोर्ट ने मूल वाद को ही खारिज कर दिया।
दरअसल, वर्ष 1988 में दायर दीवानी वाद में वादी ने अदालत से घोषणा की मांग की थी कि अपीलार्थी दिवंगत व्यक्ति की विधवा नहीं हैं और उनके दोनों बेटे उस व्यक्ति के वैध पुत्र तथा उत्तराधिकारी नहीं हैं। वादी का दावा था कि दिवंगत व्यक्ति निःसंतान थे और वर्ष 1938 में उनकी मृत्यु हो गई थी। इसके बाद अपीलार्थी के साथ उनके संबंध बने, जिनसे दो बेटों का जन्म हुआ। वादी ने यह तर्क भी दिया कि ब्राह्मण विधवा होने के कारण अपीलार्थी को पुनर्विवाह का अधिकार नहीं था।
वादी के पक्ष में फैसला सुनाते हुए बलिया के अपर जिला जज-द्वितीय ने मुख्य रूप से वर्ष 1963 के एक फैसले पर भरोसा किया था। उस मामले में सीआरपीसी की धारा 488 के तहत पत्नी को 15 रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण देने का आदेश हुआ था और अपीलार्थी के दिवंगत व्यक्ति के साथ अवैध संबंध होने की बात कही गई थी।
हाईकोर्ट ने इस आधार को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि वादी ने संपत्ति में हुए कथित फर्जी नामांतरण को चुनौती नहीं दी और न ही उससे जुड़ी कोई परिणामी राहत मांगी। जब वादी केवल घोषणा से आगे की राहत मांग सकता था, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया, तो केवल घोषणा की राहत नहीं दी जा सकती।
अदालत ने कहा कि वादी ने स्वयं स्वीकार किया है कि अपीलार्थी का विवाह दिवंगत व्यक्ति के साथ हुआ था और उनकी मृत्यु वर्ष 1938 में हुई थी। इसलिए उनकी मृत्यु के बाद अपीलार्थी को विधवा का कानूनी दर्जा प्राप्त होना स्वाभाविक कानूनी परिणाम है। बाद में किसी अन्य व्यक्ति के साथ अवैध संबंध होने से यह दर्जा समाप्त नहीं हो जाता।
बच्चों की वैधता के सवाल पर भी हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि साक्ष्य अधिनियम की धारा 112 के तहत वैध विवाह के दौरान जन्मे बच्चे के वैध होने की उपधारणा को केवल इस आधार पर समाप्त नहीं किया जा सकता कि मां के किसी अन्य व्यक्ति के साथ संबंध थे। इसके लिए यह साबित करना आवश्यक है कि संबंधित अवधि में पति-पत्नी के बीच एक-दूसरे तक पहुंच ही नहीं थी।
अदालत ने पाया कि वर्ष 1960 के कथित संबंधों को लेकर वादी या उसके गवाहों की जानकारी के समर्थन में कोई ठोस साक्ष्य पेश नहीं किया गया। स्वतंत्र साक्ष्य का भी अभाव था। इसलिए हाईकोर्ट ने इन आरोपों को निराधार माना।
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि वर्ष 1963 की कार्यवाही में अपीलार्थी पक्षकार नहीं थीं, इसलिए साक्ष्य अधिनियम की धारा 33 की आवश्यक शर्तें पूरी नहीं होतीं। अदालत ने कहा कि वह फैसला धारा 41 के तहत ‘जजमेंट इन रेम’ भी नहीं था, क्योंकि सीआरपीसी की धारा 488 के तहत हुई कार्यवाही वैवाहिक, वसीयती, नौवहन या दिवालियापन संबंधी क्षेत्राधिकार में नहीं आती।
अदालत ने कहा कि धारा 488 के तहत कार्यवाही त्वरित और संक्षिप्त प्रकृति की थी, जिसमें स्वामित्व या उत्तराधिकार के अधिकारों का अंतिम निर्धारण नहीं किया जाता। आपराधिक अदालत में दर्ज निष्कर्ष किसी दीवानी मुकदमे में स्वतः बाध्यकारी नहीं होते। अधिक से अधिक उन्हें रिकॉर्ड पर मौजूद एक परिस्थिति के रूप में देखा जा सकता है। इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने बलिया की अपर जिला जज-द्वितीय अदालत के फैसले और डिक्री को रद्द कर दिया तथा मूल वाद को खारिज कर दिया।


