भारतीय वायुसेना ने वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के नजदीक पूर्वी लद्दाख के दुर्गम और अत्यधिक ऊंचाई वाले क्षेत्र में अपनी सामरिक शक्ति का लोहा मनवाते हुए नया इतिहास रच दिया है। वायुसेना के चार इंजनों वाले भारी रणनीतिक परिवहन विमान आईएल-76एमडी (IL-76MD), जिसे भारतीय सेना में ‘गजराज’ के नाम से जाना जाता है, ने समुद्र तल से 13,629 फीट की ऊंचाई पर स्थित न्योमा एयरबेस पर सफलतापूर्वक सुरक्षित लैंडिंग की। भारतीय वायुसेना के अनुसार, यह पूरे विश्व में आईएल-76 श्रेणी के भारी विमान द्वारा अब तक की सबसे अधिक ऊंचाई पर की गई लैंडिंग का एक अभूतपूर्व रिकॉर्ड है। वास्तविक नियंत्रण रेखा से महज 25 किलोमीटर की दूरी पर स्थित इस अग्रिम एयरफील्ड पर भारी सैन्य विमान उतारकर भारत ने सीमांत क्षेत्रों में अपनी त्वरित सैन्य तैनाती की क्षमता का मजबूत संदेश दिया है।
पतली हवा और बेहद कम ऑक्सीजन के बीच पायलटों का अदम्य कौशल
अत्यधिक ऊंचाई वाले बर्फीले इलाकों में भारी सैन्य परिवहन विमानों को उतारना तकनीकी और रणनीतिक दृष्टिकोण से अत्यंत जोखिम भरा माना जाता है। 13 हजार फीट से अधिक की ऊंचाई पर वायुमंडलीय दबाव कम होने और हवा बेहद पतली होने के कारण विमान के इंजनों का थ्रस्ट (शक्ति) और विंग्स की लिफ्ट क्षमता काफी घट जाती है, जिससे विमान को संतुलित रखने के लिए लंबी रनवे और अत्यधिक गति नियंत्रण की आवश्यकता होती है। इसके अलावा शून्य से नीचे गिरते तापमान और तेज हवाओं के बीच वायुसेना के जांबाज पायलटों ने अद्वितीय तकनीकी दक्षता, सूझबूझ और पेशेवर महारत का परिचय देते हुए इस 40 टन वजन ले जाने में सक्षम विशालकाय विमान को सुरक्षित जमीन पर उतारा।
1962 के बाद अब फाइटर-कैपेबल बेस बना न्योमा, चीन सीमा पर बदली रणनीतिक तस्वीर
न्योमा एयरबेस का इतिहास बेहद रणनीतिक रहा है। वर्ष 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान इसे एक एडवांस्ड लैंडिंग ग्राउंड (ALG) के रूप में तैयार किया गया था, लेकिन युद्ध के बाद यह कई दशकों तक वीरान पड़ा रहा। वर्ष 2009 में वायुसेना ने एएन-32 विमान उतारकर इसे पुनर्जीवित किया था। गलवान घाटी की तनातनी के बाद सीमा सड़क संगठन (BRO) ने त्वरित गति से काम करते हुए यहां करीब 3 किलोमीटर लंबी आधुनिक पक्की रनवे और सैन्य बुनियादी ढांचा तैयार किया। वर्ष 2025 में वायुसेना प्रमुख ने सी-130जे सुपर हरक्यूलिस विमान से उतरकर इसे पूर्ण रूप से चालू घोषित किया था। अब आईएल-76 की सफल लैंडिंग के साथ ही न्योमा दुनिया के सबसे ऊंचे पूर्ण सैन्य और फाइटर-सक्षम एयरफील्ड्स में मजबूती से स्थापित हो चुका है।
घंटों में पहुंचेगी तोपें, बख्तरबंद गाड़ियां और रसद; भारतीय सेना की गतिशीलता में भारी इजाफा
इस सफल ऑपरेशन का सबसे बड़ा सामरिक महत्व यह है कि अब लद्दाख सीमा पर भारतीय सेना की निर्भरता केवल मौसमी सड़कों पर नहीं रहेगी। सामान्य दिनों में लेह या मनाली के रास्ते दुर्गम पहाड़ी दर्रों से होते हुए अग्रिम चौकियों तक भारी तोपखाने, टी-90 टैंक, बख्तरबंद गाड़ियां, गोला-बारूद और सैनिक टुकड़ियां पहुंचाने में कई दिनों का समय लग जाता था, जिसे अब वायुसेना के भारी परिवहन बेड़े के जरिए महज कुछ घंटों में पूरा किया जा सकेगा। किसी भी आपातकालीन स्थिति में चीन की किसी भी उकसावे वाली कार्रवाई का जवाब देने के लिए अग्रिम मोर्चे पर त्वरित सैन्य जमावड़ा संभव होगा, जो भारत की सीमा सुरक्षा और रक्षात्मक संतुलन को अभेद्य मजबूती प्रदान करता है।


