Friday, July 31, 2026
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दैत्यों के समय हिंदुओं को रात में नहीं करनी चाहिए शादी, कथावाचक देवकीनंदन ठाकुर ने उठाए सवाल, जानिए पूरा मामला

कथावाचक देवकीनंदन ठाकुर ने रात में होने वाले विवाह, शादियों में मद्यपान की बढ़ती प्रवृत्ति, मंदिरों के प्रबंधन और राम मंदिर दान पात्र विवाद जैसे मुद्दों पर अपनी बात रखी।

देवकीनंदन ठाकुर ने समाचार एजेंसी आईएएनएस से बातचीत में कहा कि शास्त्रों के अनुसार समय का विभाजन देवताओं, पितरों और दैत्यों के समय में किया गया है। रात का समय दैत्यों का माना जाता है, इसलिए हिंदू समाज को रात में विवाह करने से बचना चाहिए। दैत्यों के समय में विवाह करके दैवीय और आदर्श जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। उन्होंने बताया कि प्राचीन भारतीय परंपरा में ‘गोधूलि बेला’ को विवाह के लिए सबसे शुभ और उत्तम समय माना जाता था। उस समय विवाह के सभी प्रमुख संस्कार और फेरे दिन में ही संपन्न होते थे। मुगल आक्रांताओं के दौर में जब बेटियों की सुरक्षा और सम्मान पर खतरा मंडराने लगा था, तब मजबूरी और आपातकालीन परिस्थितियों में लोगों ने रात के समय छिपकर विवाह करना शुरू किया। धीरे-धीरे यह एक परंपरा का रूप बन गई।

उन्होंने कहा कि अब परिस्थितियां बदल चुकी हैं और वैसा कोई खतरा नहीं है, इसलिए समाज को शोर-शराबे और अनावश्यक दिखावे से दूर रहकर फिर से दिन में विवाह करने की पवित्र परंपरा की ओर लौटना चाहिए। शादियों में मद्यपान के सेवन को लेकर भी देवकीनंदन ठाकुर ने चिंता जताई। उन्होंने कहा कि विवाह हिंदू धर्म के 16 संस्कारों में से एक महत्वपूर्ण संस्कार है। ऐसे पवित्र अवसर पर मद्यपान करना अत्यंत दूषित विषय है। इसका नकारात्मक प्रभाव केवल परिवार पर ही नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों और बच्चों के जीवन पर भी पड़ता है। विवाह को जितना अधिक पवित्र रखा जाएगा, समाज उतना ही स्वस्थ और संस्कारित बनेगा।

उन्होंने राम मंदिर दान पात्र विवाद पर बोलते हुए शास्त्रों का जिक्र किया और कहा कि शास्त्रों में लिखा है कि जो व्यक्ति मंदिर के धन का दुरुपयोग करता है, उसे 60 हजार वर्षों तक विष्ठा (मल) का कीड़ा बनकर कष्ट भोगना पड़ता है। यदि लोगों को इस बात का वास्तविक ज्ञान हो जाए तो कोई भी मंदिर का एक रुपया तक चुराने की हिम्मत नहीं करेगा। मंदिरों के प्रबंधन में सरकारी हस्तक्षेप का विरोध करते हुए देवकीनंदन ठाकुर ने ‘सनातन बोर्ड’ के गठन की मांग की। उन्होंने कहा कि मंदिरों और धार्मिक संस्थाओं का संचालन धर्म के जानकार, मर्मज्ञ और धर्मनिष्ठ लोगों के हाथों में होना चाहिए। इस बोर्ड का अध्यक्ष चारों शंकराचार्यों में से किसी एक को बनाया जाना चाहिए, ताकि सनातन धर्म और धार्मिक संस्थाओं का संचालन सही दिशा में हो सके।

न्याय व्यवस्था पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि अदालतों में जांच और न्यायिक प्रक्रिया इतनी लंबी हो जाती है कि फैसला आने तक वर्षों बीत जाते हैं। उन्होंने कहा कि कहीं ऐसा न हो कि फैसला आने से पहले ही आरोपी की हार्ट अटैक से मौत हो जाए और भगवान राम अपनी दक्षिणा की प्रतीक्षा करते रह जाएं। उन्होंने कहा कि जिन लोगों ने श्रीराम की मर्यादा का उल्लंघन किया है और गलती की है, उनसे तुरंत धन वापस लिया जाना चाहिए। मामले को वर्षों तक अदालतों में घसीटने से बेहतर है कि दोषियों को तत्काल उनके पदों से हटाया जाए।

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