देश में तेजी से बढ़ रहे डिजिटल अरेस्ट स्कैम को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने चिंता जताई है। गुरुवार, 29 अक्टूबर को मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस मामले में सुनवाई करते हुए सवाल उठाया कि लोग पुलिस गिरफ्तारी के नाम पर ठगों के झांसे में कैसे आ जाते हैं। अदालत ने कहा कि लोकतांत्रिक देश में मोबाइल फोन के जरिए गिरफ्तारी होने की बात पर लोगों को भरोसा नहीं करना चाहिए।
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने इस बात पर भी नाराजगी जताई कि लगातार जागरूकता अभियान चलाए जाने और मीडिया में खबरें आने के बावजूद पढ़े-लिखे लोग भी इस तरह की धोखाधड़ी का शिकार हो रहे हैं। अदालत ने संकेत दिया कि ऐसे मामलों में केवल घटना के बाद कार्रवाई करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि ठगी को रोकने के लिए प्रभावी व्यवस्था बनाना जरूरी है।
एक महिला ने गंवाए 2.5 करोड़ रुपये
सुनवाई के दौरान न्याय मित्र (एमिकस क्यूरी) ने अदालत को बताया कि डिजिटल अरेस्ट के नाम पर धोखाधड़ी के मामले लगातार सामने आ रहे हैं। उन्होंने एक हालिया घटना का उल्लेख करते हुए कहा कि पिछले सप्ताह एक महिला को कथित तौर पर इस तरह के घोटाले में 2.5 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ।
इस पर CJI सूर्यकांत ने सवाल किया कि जब लोगों को लगातार इस तरह के अपराधों के बारे में बताया जा रहा है, तो वे ठगों के जाल में क्यों फंस रहे हैं। उन्होंने कहा कि लोगों को यह समझना चाहिए कि मोबाइल फोन पर किसी अधिकारी के वीडियो कॉल करने या गिरफ्तारी की धमकी देने से वास्तविक गिरफ्तारी नहीं हो जाती।
‘मोबाइल पर गिरफ्तारी का डर कैसा?’
मुख्य न्यायाधीश ने सुनवाई के दौरान पीड़ितों की मानसिक स्थिति और ठगों के प्रभाव को लेकर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि लोग गिरफ्तारी के डर से अपनी मेहनत की कमाई ठगों को सौंप देते हैं, जबकि उन्हें ऐसे दावों की सत्यता की जांच करनी चाहिए।
न्याय मित्र ने अदालत को बताया कि कुछ मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि इस तरह के मामलों में पीड़ितों पर गहरा मानसिक दबाव बनाया जाता है, जिसके कारण वे ठगों के निर्देशों का पालन करने लगते हैं। इसके बावजूद, अदालत ने कहा कि जागरूकता बढ़ाने के साथ-साथ इस अपराध को रोकने के लिए ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है।
बैंकों की भूमिका पर भी सुप्रीम कोर्ट ने उठाए सवाल
सुनवाई के दौरान अदालत ने बैंकों और वित्तीय संस्थानों की जिम्मेदारी पर विशेष जोर दिया। CJI ने सवाल किया कि जब संदिग्ध खातों में बड़ी रकम ट्रांसफर की जाती है, तो उसे समय रहते रोकने के लिए प्रभावी तंत्र क्यों नहीं बनाया जा सकता।
उन्होंने कहा कि बैंकों के पास खाताधारकों और लेन-देन से जुड़ी जानकारी होती है। ऐसे में संदिग्ध गतिविधियों की पहचान करके तुरंत कार्रवाई करने की व्यवस्था होनी चाहिए। अदालत ने इस बात पर भी जोर दिया कि फर्जी न्यायिक आदेशों या गिरफ्तारी संबंधी दावों की पुष्टि आधिकारिक स्रोतों से की जानी चाहिए।
RBI और साइबर एजेंसियों की कार्रवाई पर चर्चा
सुनवाई के दौरान अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने अदालत को बताया कि इस दिशा में प्रगति हुई है। उनके अनुसार, पहले की तुलना में बैंक अब संदिग्ध लेन-देन की पहचान करने पर अधिक ध्यान दे रहे हैं। उन्होंने भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के साथ नियमों को लेकर हुई चर्चा और भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C) की भूमिका का भी उल्लेख किया।
हालांकि, CJI ने इस पर जोर दिया कि केवल ठगी होने के बाद जांच और कार्रवाई करना पर्याप्त नहीं है। अदालत के मुताबिक, ऐसी व्यवस्था विकसित करने की जरूरत है, जिससे संदिग्ध लेन-देन को समय रहते रोका जा सके और पीड़ितों का नुकसान कम हो।
बैंकों पर जवाबदेही तय करने की जरूरत
सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि डिजिटल ठगी रोकने के लिए बैंकों की जवाबदेही तय करना महत्वपूर्ण है। अदालत की चिंता इस बात को लेकर थी कि यदि वित्तीय संस्थान समय रहते संदिग्ध लेन-देन पर रोक लगाने में नाकाम रहते हैं, तो केवल जागरूकता अभियान से समस्या का समाधान नहीं होगा।
डिजिटल अरेस्ट स्कैम में ठग अक्सर खुद को पुलिस, सीबीआई या अन्य सरकारी एजेंसियों का अधिकारी बताकर लोगों को डराते हैं। वे गिरफ्तारी, जांच या कानूनी कार्रवाई का भय दिखाकर बैंक खातों से पैसे ट्रांसफर करवाते हैं। कानून के तहत डिजिटल अरेस्ट नाम की कोई वैध गिरफ्तारी प्रक्रिया नहीं है। यदि कोई व्यक्ति फोन या वीडियो कॉल पर गिरफ्तारी की धमकी देकर पैसे मांगता है, तो सतर्क रहें और तुरंत साइबर अपराध हेल्पलाइन 1930 या आधिकारिक पोर्टल पर शिकायत करें।


